योग और स्वास्थ्य : पाचन/उदर – समूह के योगासन , बता रहे हैं योग गुरु ऋषि वशिष्ठ
अभ्यास 4:
पवनमुक्तासन
चरण 1:
प्रारम्भिक स्थिति में लेट कर शरीर को विश्रान्त करें।
दाहिने घुटने को मोड़ें और जाँघ को वक्ष के निकट लायें। दोनों हाथों की उँगलियों को फंसाकर दाहिने घुटने के पास कस कर पकड़े। बायें पैर को सीधा कर जमीन पर रखें। गहरी श्वास लेकर फेफड़ों को जितना सम्भव हो, भरें।
श्वास छोड़ते हुए सिर और कन्धों को जमीन से ऊपर उठायें और बिना जोर लगाए नाक से दाहिने घुटने का स्पर्श करने का प्रयास करें। अन्तिम स्थिति में कुछ क्षणों तक रुकें। फिर धीरे-धीरे श्वास लेते हुए प्रारम्भिक स्थिति में लौट आयें। शरीर को शिथिल करें।
दाहिने पैर से 3 बार और बायें पैर से 3 बार इसे दुहरायें।
अभ्यास टिप्पणी-
यह ध्यान रखें कि जो पैर सीधा है, वह जमीन के सम्पर्क में रहे। दाहिने पैर से ही अभ्यास प्रारम्भ करना है. क्योंकि यह सीधे अधिरोही (ऊर्ध्वगामी) वृहदान्त्र को दबाता है। उसके बाद बायें पैर से अभ्यास करें, क्योंकि इससे अवरोही (निम्नगामी) वृहदांत्र दबता है।
चरण 2:
प्रारम्भिक स्थिति में रहें।
दोनों घुटनों को मोड़ें और जाँघों को वक्ष के पास लायें।
हाथों की उँगलियों को आपस में फंसाकर घुटनों के ठीक नीचे पिण्डलियों के ऊपरी भाग को दोनों हाथों से कसकर पकड़ें। गहरी श्वास लें। श्वास छोड़ते हुए सिर एवं कन्धों को उठायें और नाक को दोनों घुटनों के बीच के स्थान पर रखने का प्रयास करें। श्वास को कुछ क्षणों तक बाहर रोक कर मानसिक गणना करते हुए सिर और कन्धों को इसी स्थिति में रखें।
श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर, कन्धों और पैरों को नीचे लायें। यह अभ्यास तीन बार करें।
सजगता –
श्वास, उदर के दवाव और गति पर।
सीमायें-
उच्च रक्तचाप अथवा सायटिका और स्लिप डिस्क जैसे रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह अभ्यास वर्जित है।
लाभ-
सुप्त पवनमुक्तासन पीठ के निम्न भाग की पेशियों को मजबूती प्रदान करता है और मेरुदण्ड की कशेरुकाओं को लचीला बनाता है। यह उदर और पाचन अंगों की मालिश करता है, इसलिए वायु-विकार और कब्त को दूर करने में बड़ा प्रभावी है। नितम्बों की पेशियों पेशियों और प्रजननांगों की मालिश कर यह नपुंसकता, बन्ध्यापन और मासिक-धर्म सम्बन्धी समस्याओं के निदान में सहायक है।
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