समलैंगिकता का भारतीय संस्कृति में नहीं है स्थान: ओमवीर सिंह आर्य‌

जन आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमवीर आर्य एडवोकेट ने बताया कि  जन आंदोलन सामाजिक संगठन ने समलैंगिकता के विरोध में जिलाधिकारी अनुपस्थिति में उमेश चन्द निगम डिप्टी कलेक्टर गोतमबुद्धनगर को राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन और बताया कि माननीय महामहिम राष्ट्रपति महोदय भारत देश।

पत्र में लिखा है कि  —  विषय- माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शीघ्रता एवं आतुरता में, समलैंगिक व्यक्तियों के विवाह को विधि मान्यता न देने बावत अनुरोध पत्र

आदरणीय महोदय,

जन आंदोलन एक सामाजिक संगठन है जो समय-समय पर राष्ट्रहित के मुद्दे अक्सर उठाता रहता है वर्तमान में भी समलैंगिकता विषय पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे।

भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समलैगिंक एवं विपरीत लिंगी (Transgender) आदि व्यक्तियों के विवाह के अधिकार को विधि मान्यता देने का निर्णय लेने की, तत्परता बताई है, उक्त तत्परता / आतुरता से विचलित होकर, अधोहस्ताक्षरकर्तागण ने निम्नलिखित महत्वूपर्ण बिन्दुओं पर यह अभ्यावेदन प्रस्तुत किया है :-

1. भारत देश, आज, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों की अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब विषयांतर्गत विषय को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनने एवं निर्णीत करने की कोई गंभीर आवश्यकता नहीं है। देश के नागरिकों की बुनियादी समस्याओं जैसे गरीबी उन्मूलन, निःशुल्क शिक्षा का क्रियान्वयन, प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार, जनसंख्या नियंत्रण की समस्या, देश की पूरी आबादी को प्रभावित कर रही है, उक्त गंभीर समस्याओं के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न तो कोई तत्परता दिखाई गयी है ना ही कोई न्यायिक सक्रियता दिखाई है।

2.भारत विभिन्न धर्मो, जातियों, उप जातियों का देश है। इसमें शताब्दियों से केवल जैविक पुरूष एवं जैविक महिला के मध्य, विवाह को मान्यता दी है। विवाह की संस्था न केवल दो विषम लैगिंको का मिलन है, बल्कि मानव जाति की उन्नति भी है। शब्द “विवाह” को विभिन्न नियमों, अधिनियमों, लेखों एवं लिपियों में परिभाषित किया गया है। सभी धर्मों में केवल विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के विवाह का उल्लेख है । विवाह को दो अलग लैंगिकों के पवित्र मिलन के रूप में, मान्यता देते हुये, भारत का समाज विकसित हुआ है, पाश्चात्य देशों में लोकप्रिय, दो पक्षों के मध्य, अनुबंध या सहमति को मान्यता नहीं दी है।

3.भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नालसा (2014), नवतेज जौहर (2018) के मामलों में समलैगिकों एवं विपरीत लिंगी (Transgender) के अधिकारों को पूर्व से ही संरक्षित किया है। जिससे यह समुदाय, पूरी तरह से उत्पीड़ित या असमान नहीं है, जैसा कि उनके द्वारा बताया जा रहा है। इसके विपरीत भारत की अन्य पिछड़ी जातियां, आज भी जातिगत आधार पर शोषित एवं वंचित हो रही है, जो आज भी अपने अधिकारों के लिये, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को, अपने पक्ष में निर्णीित होने का इंतजार कर रही है। ऐसी स्थिति में, समान लैगिकों के विवाह को विधि मान्यता दिये जाने की मांग, उनका मौलिक अधिकार न होकर, वैधानिक अधिकार हो सकता है, जो केवल भारत की संसद द्वारा कानून बनाकर ही संरक्षित किया जा सकता।

4.विधायिका ने पहले ही उपरोक्त निर्णयों के आधार पर कार्यवाही कर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 को अधिनियमित किया है और इसलिये इस समुदाय की यह आशंका या कथन, कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें मूल अधिकार प्रदान नहीं किये गये हैं, सर्वथा गलत है। ऐसे हर एक व्यक्ति के अधिकार की देखभाल / संरक्षण, विधायिका द्वारा किया जा रहा है। उक्त अधिनियम के अधिनियमित हो जाने पर उक्त कथित समुदाय के व्यक्तियों को यह दावा / मांग करने का मौलिक अधिकार नहीं है कि उनके विवाह को विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत, पंजीकृत एवं मान्यता प्राप्त की जावे ।

5.यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस समुदाय विशेष द्वारा विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत, अधिकार बनाने की मांग की जा रही है जबकि उक्त अधिनियम, मात्र जैविक पुरूष और महिला पर लागू होता है, इसलिये किसी भी प्रावधान को हटाने / बढ़ाने का कोई भी प्रयास, अथवा उक्त अधिनियम (प्रावधान) को नये तरीके से परिभाषित करना, उसे नये स्वरूप में लिखना, निश्चित एवं स्पष्ट रूप से, विधायिका से कानून बनाने की शक्ति ले लेना माना जावेगा।

6. विवाह एक सामाजिक, कानूनी संस्था है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत, सक्षम विधायिका द्वारा अपनी शक्ति का प्रयोग कर बनाया है, उसे कानूनी रूप से मान्यता प्रदान की और विनियमित किया गया । “विवाह” जैसे मानवीय संबंधों की मान्यता, अनिवार्य रूप से विधायी कार्य है। न्यायालय, “विवाह” नामक संस्था को न्यायालयीन व्याख्या से, विधायिका द्वारा दिये गये विवाह संस्था के मूर्त स्वरूप को, ना तो नष्ट कर सकती है ना ही नवीन स्वरूप बना सकती है। और ना ही मान्यता दे सकती है।

7.भारत में “विवाह” का एक सभ्यतागत महत्व है और एक महान और समय की कसौटी पर खरी उतरी, वैवाहिक संस्था को कमजोर करने के किसी भी प्रयास का, समाज द्वारा मुखर विरोध किया जाना चाहिये । भारतीय सांस्कृतिक सभ्यता पर सदियों से, निरन्तर आघात हो रहे हैं, फिर भी, अनेक बाधाओं के बाद भी, वह बची हुई है। अब स्वतंत्र भारत में, इसे अपनी सांस्कृति जड़ों पर, पश्चिमी विचारों, दर्शनों एवं प्रथाओं के अधिरोपण का सामना करना पड़ रहा है, जो इस राष्ट्र के लिये व्यवहारिक नहीं है।

8.उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में हम इस महत्वपूर्ण विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिखाई जा रही आतुरता पर अपनी गहन पीड़ा व्यक्त करते हैं। न्याय की स्थापना एवं न्याय तक पहुंचने के मार्ग को सुनिश्चित करने तथा न्याय पालिका की विश्वनीयता को कायम रखने के लिये, लंबित मामलों को पूरा करने एवं महत्वपूर्ण सुधार करने के स्थान पर एक काल्पनिक मुद्दे पर न्यायालयीन समय एवं बुनियादी ढांचे को नष्ट / उपयोग किया जा रहा है, जो सर्वथा अनुचित है ।

अतएव हम आपसे सविनय निवेदन करते हैं कि आप उक्त विषय पर, सभी हितबद्ध व्यक्तियों / संस्थाओं से परामर्श करने के लिये, आवश्यक कदम उठाये और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करें कि समलैंगिक विवाह, न्याय पालिका द्वारा वैद्य घोषित नहीं किया जाये, क्योंकि उक्त विषय, पूर्ण रूप से, विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है।

ज्ञापन सौंपने में ओमवीर सिंह आर्य एडवोकेट राष्ट्रीय अध्यक्ष जन-आंदोलन, अजीत नागर एडवोकेट, एमएस नागर एडवोकेट, के.डी मिश्रा एडवोकेट, अनिल कसाना एडवोकेट, सुरेंद्र नागर एडवोकेट, ओमवीर एडवोकेट, सोबीन्दर नागर एडवोकेट एवं अन्य अधिवक्तागण साथी उपस्थित रहे।

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