श्री धार्मिक रामलीला मंचन : प्रभु श्रीराम का पांव पखारने के बाद केवट ने पार कराई नदी

श्री धार्मिक रामलीला कमेटी ग्रेटर नोएडा द्वारा आयोजित रामलीला मंचन   रामलीला मैदान सैक्टर पाई एक एच्छर में गोस्वामी सुशील जी महाराज के कुशल निर्देशन में आयोजित हो रहा है। 
 
आज के मंचन की शुरुआत हुई   राजा दशरथ गुरू वशिष्ठ जी की संवाद से जिसमे राजा दशरथ कहते हैं कि मेरी एक अभिलाषा हैं कि राम कोराजा घोषित कर दिया जाए।  यह सुनकर मुनि वशिष्ठ अति प्रसन्न हुए। राजा ने अपने मंत्री और सेवकों को बुलाकर पूछा अगर आप लोगों को अच्छा लगे तो राम का राजतिलक कर दिया जाये।  राम के राजतिलक की बात सुनकर सभी अयोध्यावासी खुशी से झूम उठते हैं और  गीत गाते हैं । उधर देवता सोचते हैं कि अगर राम को वनवास नहीं हुआ तो निशाचरों का नाश कैसे होगा। 
  इसके लिए उन्होंने सरस्वती जी से प्रार्थना की और सरस्वती कैकेयी की दासी मंथरा की बुद्धि  फेर देती हैं। मंथरा कैकेयी को बरगलाती है कि इस राजतिलक में सिर्फ राम का भला है । भरत को कुछ नहीं मिलेगा। कैकेयी कोप भवन में चली जाती हैं और जब राजा दशरथ कैकेयी से कोप भवन में जाने का कारण पूछते हैं तो वह राजा को पहले दिये गये उनके वचन को याद दिलाती है कि समय आने पर दो वरदान मांग लेना, मैं पहला वरदान भरत को राज व दूसरा रामको 14 वर्ष का वनवास मांगती हूँ। राजा के समझाने के बावजूद कैकेयी नहीं मानती तो यह सुनकर दशरथ हे राम हे राम कहते हुए मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं। भगवान राम को यह पता लगता है तो वह 14 वर्ष के वनवास के लिए तैयार हो जाते हैं।  उनके साथ लक्ष्मण व सीता भी तपस्वी वेष में अयोध्या से जाने लगते हैं। सभी नगरवासी विलाप करते हुए राम को रोकने का प्रयास करते हैं ‘‘ मत जाओ मत जाओ मत जाओ हे राम अयोध्या छोड़कर मत जाओ। रूक जाओ रूक जाओ रूक जाओ हे नाथ हमारी विनती मत ठुकराओ’’। मंत्री सुमंत्र राम, लक्ष्मण व सीता को रथ पर बिठाकर नगर के बाहर ले जाते हैं।  श्रृंगवेर पुर पहुंचने पर गंगा जी में स्नान करते हैं। राम आगमन सुनकर निषादराज गुह भगवान राम की आवभगत करता है।  इस के बाद सुमंत्रजी अयोध्या वापस लौट आते हैं और राजा दशरथ  राम के वियोग में अपने प्राण त्याग देते हैं। भगवान राम सीता लक्ष्मण के साथ गंगा तट पर पहुँचते हैं जहाँ पर भक्त केवट और भगवान का सुंदर संवाद होता है। भरत माता कैकई को सफेद वस्त्रों में देखकर भौचक्के रह जाते हैं वह इसका कारण कैकई से पूछते हैं। कैकई पूरा वृतांत सुनाती है और कहती मेने राजा दशरथ द्वारा दिये गए अपने वरदानो के आधार पर राम के लिये14 वर्षों का वनवास ओर तुम्हारे लिये राज मांगा है। यह सुनकर भरत माता कैकई को अपनी माता कहने के सुख से वंचित करते हुए कहते हैं कि आज के पश्चात आप मेरी माता नही हो आपने माता कहने का अधिकार खो दिया है। मेरे पिता की हत्या ओर मेरे भाई राम को वनवास भेजने वाली मेरी माता कैसे हो सकती है। वह ईश्वर को साक्षी मानकर यह सौगंध लेते हैं ओर राम,लक्ष्मण और सीता को ढूंढने निकल पड़ते हैं। भगवान राम, सीता, लक्ष्मण व निषादराज के साथ प्रयागराज में भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचते हैं वहां ठहरने के पश्चात मुनि से विदा लेकर चित्रकुट में वाल्मीकि जी के आश्रम में पहुंचते हैं जहां पर भरत, सुमंत्र, शत्रुध्न व मां कैकई के साथ राम को मनाने पहुंचते हैं
लेकिन राम पिता की आज्ञा के कारण वन से अयोध्या वापस नहीं जाते तब भरत उनकी चरण पादुका लेकर अयोध्या वापस आ जाते हैं ।

देख दर्शक भावविभोर हो जाते हैं। आज की लीला के मंचन में गोस्वामी सुशील जी महाराज, सुशील नागर,आनंद भाटी अध्यक्ष श्री धार्मिक रामलीला कमेटी ग्रेटर नोएडा, राजकुमार नागर शेर सिंह भाटी , अजय नागर, इलम सिंह नागर, धीरेंद्र भाटी, जितेंद्र भाटी, ममता तिवारी महासचिव, अजय नगर कोषाध्यक्ष, सुभाष भाटी, महेश शर्मा, शरद बंसल, रकम सिंह भाटी, वीरपाल मावी, प्रदीप पंडित,रोशनी सिंह आदि रामलीला के कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी मौजूद रहे।  

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