शारदीय नवरात्र पर्व–घट स्थापना पर विशेष निर्णय : पं.मूर्तिराम,आनन्द बर्द्धन नौटियाल

भारतवर्ष में सभी जगह नवरात्र पर्व उल्लास एवं उत्साह से मनाया जाता है!

प्रथम तीन दिन दुर्गा (महाकाली) प्रधान पूजन!

द्वितीय तीन दिन महालक्ष्मी प्रधान पूजन!
एवं

अंतिम तीन दिन महासरस्वती की प्रधान पूजा होती है!

तिथी को ही देवी स्वरूपा माना है!अतः नवतिथि आधार पर ही नवरात्रि किए जाते हैं! प्रत्येक तिथि की पूजा उस अतिथि की महाशक्ति को अर्पण करें!

संप्रदाय भेद से इन्हें चार भागों में विभाजित किया गया है!
1..शैव संप्रदाय.!
2.. दक्षिण भारत वर्षे..!
3… वैष्णव संप्रदाय…!
5… माधव संप्रदाय…!
चतु: नवरात्र विषये विशेष विचार—
महाकाल संहिता के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र आते हैं अलग-अलग युग में अलग-अलग मास की महिमा रही है!
1.. सतयुग में चैत्र शुक्लपक्ष..!
2… त्रेतायुग में आषाढ़ शुक्लपक्ष ..!
3…द्वापर में माघ शुक्लपक्ष..!
एवं
4…कलयुग में आश्विन शुक्लपक्ष की नवरात्र पूजा प्रधान है..

नवरात्र क्रम दुर्गा पूजा प्रबोधन विचार-
शारदीय नवरात्रप र्वे दुर्गा उपासना– शास्त्रों में लिखा है कि शरद काल में दैवी का बोधन कर पूजा करें! शरद ऋतु देवताओं की रात्रि है!
भगवती का शयन काल ( अकाल ) है! प्रभु श्रीराम ने ब्रह्मा को आचार्य बनाकर देवी का बोधन कर अकाल में जगाया था!
बसंत काल की पूजा बोधित पूजा है!शारदीय नवरात्र का महत्व केवल श्रीराम द्वारा पूजित होने से ही नहीं है! इससे पूर्व में भी देवी पूजा का विधान रहा है!
ब्रह्मवैवर्त पुराण के समय समय-समय पर देवों ने पूजा की थी वासंतीय नवरात्र एवं शारदीय नवरात्र में समानता है!
दुर्गा पूजन उत्सव के दो प्रधान अंग–

1…आगमनि !
और
2….विजया !
आगमनि में कैलाश धाम से माँ पार्वती का हिमालय पितृग्रह में आगमन एवं सप्तमी,अष्टमी और नवमी पितॄग्रह में मां की उपस्थिति तथा दशमी को विज या का विसर्जन अथवा मां पार्वती का स्वामीगृह गमन!
इस कारण सप्तमी,अष्टमी,नवमी एवं दशमी को पूजा उत्सव का विशेष महत्व है!
….(दुर्गा सप्तशती सर्वस्वम पेज 41.54 )
नवरात्र पर्व हेतु उपक्रम में आश्विन कृष्ण अष्टमी से आश्विन शुक्ल नवमी तक पूजन क्रम है!
वही नवरात्र पर्व हेतु अन्य विषय भेद भी है! आश्विन कृष्ण अष्टमी या नवमी के दिन जब आद्रा नक्षत्र प्राप्त हो उस दिन देवी पूजा करें वह गाजे बाजेआदि के द्वारा देवि का बोधन करें! इसके बिना नवरात्र पूजा फलहीन है!
अतः आश्विन कृष्णा नवमी से आश्विन शुक्ल नवमी तक का विधान भी है!(भद्रकाली कल्प)में आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को प्रबोधन लिखा है!
( लिंगपुराण एवं दुर्गा उपासना कल्पद्रुम )
श्री विक्रमादित्य संवत 2078 शक संवत 1943 आश्विन शुक्ल पक्ष तिथि प्रतिपदा समाप्ति 13: 41: 58 बजे pm नक्षत्र चित्रा समाप्ति 21: 08 :43 बजेpm योग वैधृति 25 : 36: 34 बजे am करण बव 13 : 41: 58 बजे pm दिन गुरुवार दिनांक 07 : 10 : 2021 को शारदीय नवरात्र पर्व आरंभ होगा!
अति आवश्यकता में ” घट स्थापना मुहूर्त – समय अभिजित”” — दोपहर 11: 53 :19 amसे 12: 41:19 pmतक !
नोट– यहां पर दिया गया अभिजित मुहूर्त निर्णय मंदसौर के सूर्योदय पर आधारित है! घट स्थापना मुहूर्त साधन हेतु अपने-अपने नगर का अभिजित मुहूर्त समय साधन स्थानीय पंचांग के आधार पर करना चाहिए!
नोट– इस वर्ष आश्विन शुक्ल पक्ष में “चतुर्थी तिथि ” का क्षय हुआ है! इस कारण 8 दिन का ही नवरात्र पर्व मान्य होगा !
श्री संवत 2078 शक 1943 तिथि नवमी समाप्ति 18:51:31 बजे pm नक्षत्र उत्तराषाढ़ा समाप्ति 09: 33 :30 बजेam परम् श्रवण नक्षत्र योग्य धृति समाप्ति 25 : 43 :40 बजे दिन गुरुवार दिनांक 14:10: 2021 को श्री दुर्गानवमी “महानवमी”को नवरात्रि पूर्ण होगी!
देवी वाहन विचार— इस वर्ष देवी मां डोली में विराजमान होकर आ रही है ! यह नवरात्रि के नव दिन देवी के नौ स्वरूपों को समर्पित होते हैं! प्रत्येक दिन प्रत्येक एक रूप को समर्पित होता है!
धर्म शास्त्र सम्मत ऐसी मान्यता है कि–जिस वर्ष माता डोली में सवार होकर आगमन करती है वह वर्ष बहुत शुभ होता है!
कहा गया है गुरुवार या शुक्रवार से जिस वर्ष नवरात्रि का आरंभ हो उस वर्ष देवी मां डोली पर सवार होकर आगमन करती है! ईस वर्ष अश्विन नवरात्रि गुरुवार को आरंभ हो रही है इस कारण देवी डोली पर सवार आगमन कर रही है..!
घटस्थापना एवं विसर्जन विषयक विशेष विचार–
1… आश्विन शुक प्रतिपदा को 12 या 16 घड़ी (अर्थात 4 घंटा 48 मिनट या 6 घंटा 24 मिनट त्याग कर) कलश स्थापन करना चाहिए!
2… अमावस्या युक्त प्रतिपदा में घट स्थापना कदापि नहीं करें!
3.. दूसरे दिन मुहूर्त मात्र 24 मिनट एक घड़ी प्रतिपदा हो एवं द्वितीय विद्व भले हो तो उसमें घटस्थापना करें !
4.. अगर अमावस्या युक्त प्रतिपदा हो लेकिन दूसरे दिन प्रतिपदा का अभाव हो तो प्रतिपदा काल में दोपहर मध्यान्ह में घट स्थापना करें!
5… चित्रा नक्षत्र,वैधृति योग तथापि भद्रा मैं घटस्थापना नहीं करें!इसके अंत में या मध्यान्ह के बाद घटस्थापना करें !
6… देवीपुराण में प्रातःकाल ही पूजन एवं प्रातःकाल ही विसर्जन का निर्देश है!
7… सूर्यास्त के बाद एवं रात्रि में घटस्थापना भूलकर भी नहीं करें अनुष्ठान को व्यतिपात आदि अशुभ योगों में आरंभ नहीं करें !
8.. विसर्जन समय नवमी तिथि की संध्या को श्रवण नक्षत्र प्राप्त हो अथवा दशमी तिथि प्राप्त हो तब दशमी तिथि “दशहरा” को प्रातः विसर्जन करें!
व्रत उपवास विषयक विशेष विचार…
1.. व्रत उपवास नवमी तिथि तक ही करें दशमी को व्रत करने से हानि ही हानि होती है!
2. वहीं द्वितीय को घट स्थापना करने से अथवा तिथि क्षय होने के कारण 8 दिन के नवरात्र हानिकारक होते हैं!
3. यदि लगातार नव दिन नवरात्र नहीं करे तो प्रथम दिन एवं अष्टमी या नवमी को कुल प्रथानुसार करें उस दिन पूजन करें देवी को धन्य जवाहरे अर्पित करें!
यदि किसी जातक के नवरात्र भंग होते हैं तो 7 दिन 5 दिन अथवा सप्तमी अष्टमी नवमी को ही 3 दिन तक पूजन करें तथा व्रत उपवास करें!
इस वर्ष सर्वप्रथम तो 8 दिन के नवरात्र होने से तथा चित्रा वैधृति का योग घट स्थापना में होने के कारण घट स्थापना हेतु सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त का अभाव है!
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देवहित एवं मानव हित में अश्विन दुर्गा पूजा—
राम- रावण युद्ध में कालाष्टमी को कालीका युद्ध देखने आई थी और रावण पर प्रसन्न थी तब ब्रह्माजी सहित सभी देवताओं ने देवी से प्रार्थना की उसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को देवी रावण से विमुख हुई एवं देवहित में कार्य किया! इसिलिये आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दुर्गा पूजा देवहित में मानी गई है एवं शुभ फलप्रद है!
निर्णय सिंधु द्वितीय परिच्छेद भ्रष्ट 324 के अनुसार—
नवरात्र शब्द 9 दिन का परक है देवी पुराण में कहा गया है- तिथि की वृद्धि में अष्टमी में समाप्त करें! तथा तिथि क्षय में प्रतिपदा तिथि के रात में नवचंडी का प्रारंभ करें!
यहां नवरात्र शब्द नवदिन का सार्थक है यह ठीक नहीं है!अतिहृास या वृद्धि में न्यूनाधिकत्व् की आपत्ति हो जाएगी! यहां पर मूल का अभाव है! इसी कारण तिथि वाचक यह है…
उसी बात को पुनः कहा है कि– तिथी या वृद्धि के हृास में नवरात्र शब्द का कोई अर्थ नहीं है ..!
निर्णय सिंधु प्रश्न 335 ( स्थापनारोपणदिशषु प्रातःकाल निर्णय: )
रुद्रयामल में कहा गया है कि— वैधृति में घट स्थापना करने से पुत्र का नाश होता है! तथा चित्रा नक्षत्र में घट स्थापना करने से धन का नाश होता है! अतः चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग में घटस्थापना नहीं करें.!
यदि संपूर्ण प्रतिपदा चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग से युक्त हो तो मध्यान्ह के सूर्य में और अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना करें! किंतु यहां भी चित्रादि निषेध में मूल ( प्रमाण ) चिंतनीय है !
दुर्गोत्सव में कहा है कि– चित्रा और वैधृति से युक्त द्वितीया सहीत हो तो वही ग्रहण करें! भद्रान्वित यदि प्रतिपदा का लाभ हो तो विरुद्ध योग से भी वह संगत हो तो उसी में ही ज्ञानी अपरान्ह में विधान करें! वह श्री पुत्र राज्य आदि के वृद्धि का कारण होती है !
निर्णय सिंधु (कलश स्थापनादि विचार) पृष्ठ 329 —
चंडीका के अर्चन में अमावस्या युक्त प्रतिपदा धनार्थी विशेषकर न ग्रहण करें ! इससे वंश की हानि होती है ..! स्त्री पुत्र का भय होता है अथवा हानि होती है!
इस वर्ष घट स्थापना मुहूर्त निर्णय को लेकर कई प्रकार की विषमतायें निर्मित है!
अतः आचार्य एवं विद्वजन अपने स्वयं विवेक के निर्णय अनुसार ही घट स्थापना करें.!अथवा आवश्यकता में सप्तमी,अष्टमी- नवमी का उपवास कर नवरात्र पर्व का पालन करें!

 

☀ ।।जय माता दी ।।☀
।। ऊँ सर्वस्वरुपे सर्वेसे सर्व शक्ति समन्विते भवभ्यस्त्रहि नो देवी दुर्गेदेवी नमोस्तुते ।।
🌹🍁🌀🌞🍁🌀🍁🌹 🏢 कार्यालय 🌻 जगदम्बा ज्योतिष केन्द्र 🌻 पं.मूर्तिराम,आनन्द बर्द्धन नौटियाल ज्योतिषाचार्य 🌻 (देबी,नृसिंह उपासक गंगौत्रीधाम) 🔰 जन्मपत्री, वर्षफल, हस्तरेखा, वास्तुशास्त्र, नवग्रह रत्न, दुर्गापाठ,नवग्रहपाठ,महामृत्युंज्जंयपाठ,रुदाभिषेक,रामायण पाठ,भागवत कथा,सन्तान गोपालपाठ,कालसर्प दोष निवारण,गृह प्रवेश,सत्यनारायण कथा,जाप,पूजा,पाठ,कर्म काण्ड हेत्तु अवश्य सम्पर्क करें जी । 🏡 पता – मकान नम्बर -C 38,प्रथ्म तल,ओमिक्रोन-3,EWS फ्लैट,ग्रेटर नोएडा,गौतम बुद्ध नगर,उत्तर प्रदेश ☎ +91 93 10 110 914 🌐 www.jagdambajyotish. in आप कार्यालय में आकर ज्योतिष परामर्श ले सकतें हैं जी समय प्रात: 9 से 1 बजे दिन एवं 4 से 7 बजे शांय तक,मिल सकतें हैं।कृपया आने से पहले अपना समय अवश्य निर्धारित कर लें जी। 🦋💫 आप से विन्रम निवेदन है की आप हमारे पेज को अवश्य Like @ Share अवश्य करें जी 🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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