भविष्य की चिंता: दिखने लगा है जलवायु परिवर्तन का असर

कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के लिटन गांव में जब पारा 46.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा, तो गर्मी ने शीतल जलवायु के लिए जाने जानेवाले पश्चिमी भूभाग में नया इतिहास रच दिया। प्रांत में अनेक स्कूलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया गया और कोविड-19 टीकाकरण केंद्रों का स्थानांतरण कर दिया गया। जंगलों में लगी आग ने एक गांव को ही नष्ट कर दिया। उत्तर-पश्चिमी अमेरिका में अपने ठंडे कोहरे के लिए प्रसिद्ध एक क्षेत्र में गर्मी से सैकड़ों लोगों की जान चली गई। अमेरिका के पश्चिम में 12 प्रांतों में आग फैल गई। उत्तरी रॉकी पर्वत में आग उगलती गर्मी की लहर ने कोविड की भयावहता को भुला दिया। रूस की राजधानी मास्को में गर्मी ने 120 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। यूरोप में जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड में आई प्रचंडतम बाढ़ों ने 165 लोगों की जान ले ली।

 

विगत कुछ हफ्तों से पश्चिमी मीडिया में ये समाचार शीर्ष पर हैं। भविष्य में ऐसे दृश्य और भी व्यापक व भयानक रूप में दिखेंगे, ऐसी आशंकाएं भी विशेषज्ञों से लेकर आम नागरिक तक व्यक्त कर रहे हैं। इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन अब स्पष्ट रूप से अपना असर दिखा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने निष्कर्ष निकाला है कि असाधारण गर्मी ग्लोबल वार्मिंग के बिना नहीं हुई होगी। अधिक तापमान वाले वातावरण में अधिक नमी होती है, और पहले से ही दुनिया भर में अनेक तूफानों के बीच भारी वर्षा हो रही है।

 

निस्संदेह, ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप मौसम के चरम रूप की घटनाएं निरंतर और अधिकाधिक तीव्र होती रहेंगी। ग्लोबल वार्मिंग से घटित आपदाओं ने विकासशील दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में गहरे घाव छोड़ दिए हैं। जैसे, बांग्लादेश में फसलों का सफाया कर दिया है, होंडुरास में गांवों को समतल कर दिया है, भारत में प्रचंड तूफानों और भारी वर्षा की घटनाओं ने कई क्षेत्रों में त्राहि-त्राहि मचा दी है, और छोटे द्वीपीय राष्ट्रों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। भारत में विश्व संसाधन संस्थान की जलवायु कार्यक्रम की निदेशक उल्का केलकर कहती हैं, ‘विकासशील देशों में मौसम की चरम घटनाएं प्रायः बहुत-सी मौतों और विनाश का कारण बनती हैं, लेकिन इनके लिए हमें जिम्मेदार माना जाता है, न कि सौ साल से अधिक समय से ग्रीनहाउस गैसों को भारी मात्रा में उत्सर्जित करने वाले औद्योगिक देशों को।’ वह आगे कहती हैं, ‘ये विनाशकारी आपदाएं अब अमीर देशों पर प्रहार कर रही हैं, जो यह दिखाती हैं कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आर्थिक सहायता मांगने वाले विकासशील देश गलत नहीं हैं।’

एक यक्ष प्रश्न यह है कि क्या विकसित दुनिया में बढ़ती आपदाओं का प्रभाव दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों और कंपनियों पर पड़ेगा और वे ग्रीनहाउस गैसों का अपना उत्सर्जन कम करने के लिए प्रेरित होंगे। आगामी नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाली जलवायु वार्ता में रात-दिन कार्बन उत्सर्जित करने वाले विकसित देश क्या ऐसा कोई संकल्प लेंगे, जिससे जलवायु को नियामक बनाने की दिशा में कार्बन उत्सर्जन में अपेक्षित कमी आए, और क्या प्रदूषणकारी कंपनियों पर कोई लगाम कसी जाएगी?

वास्तव में, 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के बाद, जिसमें बुरे प्रभावों को टालने के लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में निरंतर वृद्धि जारी है। चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक है। वैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन इतनी नहीं कि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित कर सके। जलवायु वैज्ञानिकों द्वारा तैयार जलवायु मॉडल ने बढ़ते तापमान के विनाशकारी प्रभाव की जानकारी दी है। वर्ष 2018 में एक विस्तृत वैज्ञानिक मूल्यांकन ने चेतावनी दी थी कि औद्योगिक युग के प्रारंभ की तुलना में औसत तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से आगे बढ़ने से रोकने में विफलता तटीय शहरों की बाढ़ से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में फसलों की बर्बादी तक विनाशकारी परिणाम ला सकती है।

जलवायु समझौतों ने दुनिया को जलवायु संकट से बाहर निकालने के लिए 2030 तक उत्सर्जन को आधा करना आवश्यक बताया है, लेकिन उत्सर्जन में जिस तरह वृद्धि हो रही है, उससे लगता नहीं कि इस लक्ष्य तक पहुंचा जा सकेगा। औसत वैश्विक तापमान में 1880 से अब तक 1.0 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि रिकॉर्ड हो चुकी है। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की गति यथावत बनी रही, तो 2035 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि दर्ज होगी और सदी के अंत तक तापमान कहां पहुंचेगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जब 1.0 डिग्री तापमान बढ़ने से ही मौसम का व्यवहार इतना उग्र हो गया है, तो 2.0 डिग्री तापमान वृद्धि की स्थिति में जलवायु परिवर्तन क्या हाल करेगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दुनिया के सबसे नाजुक द्वीप राष्ट्रों के जलवायु परिवर्तन का शिकार होने की चिंता मालदीव, जो समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के खतरे से भयाक्रांत है, के पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के इस बयान से जाहिर होती है, ‘जबकि सभी समान रूप से प्रभावित नहीं होते हैं, यूरोप और उत्तरी अमेरिका की दुखद घटना बताती है कि जलवायु आपातकाल में कोई भी सुरक्षित नहीं है, चाहे वे मेरे जैसे छोटे द्वीपीय राष्ट्र या पश्चिमी यूरोपीय राज्य में रहते हों।’

ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में धड़ाधड़ उड़ेलने और फलस्वरूप जैवमंडल के नैसर्गिक जलवायु चक्र को तोड़ने वाली और आर्थिक समृद्धि के बल पर अजेयता की भावना पाले बैठी विकसित दुनिया का हाल यह है कि अमेरिका में 2010 से अब तक प्रलयंकारी बाढ़ों से 1,000 से अधिक लोग मारे गए हैं। कनाडा जंगलों की आग से अपने गांव तक को नहीं बचा पाता है। जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे विकसित देश सैकड़ों लोगों की जान एक झटके में गंवा देते हैं। पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में जलवायु परिवर्तन के तांडव ने विज्ञान और इतिहास के दो आवश्यक तथ्यों को उजागर किया है : पूरी दुनिया न तो जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तैयार है, और न ही इसके साथ जीने के लिए। -लेखक जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं।

 

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