नर सेवा ही नारायण सेवा है रट लो तुम , इस विपदा को अवसर मे मत बदलो तुम

( विशेष संकलन : राजेश मिश्रा, greno news )
ये कविता उनके लिए है जो इस आपदा को अवसर मे बदल चुके है।
सोचिये , कहि आप वीराने मे है हलक सूख रहा है,
जीव का नही निशां है, एक बूंद को गला तरस रहे है।
अचानक से कोई दिखता है जो पानी साथ लिए है,
एक बूंद जल देदे उससे यही प्रार्थना आप किये है।
पानी तो मैं तुझे दे दूंगा प्यास भी तेरी बुझ जाएगी,
लेकिन उसने कहा इसके बदले मुझे कुछ देना होगा,
एक बूंद की कीमत मे तेरी एक उँगली कट जाएगी।
सोचिये, कहि आप भी ऐसा तो नही कर रहे है
किसी मजबूर की उँगली तो नही काट रहे है,
ये धन अगर कमा भी लेंगे कौन ये भोगेगा,
क्या रक्त का पैसा आपके रक्त को लगेगा।
क्यों करते है ऐसी हायतौबा इस आपदा मे
सहारा बनो किसी मजबूर का इस विपदा मे।
आओ इस समय को सब साथ मे टालो तुम,
दूसरों को दुःखी करके पाप को मत पालो तुम।
अपना स्वार्थ कुछ देर के लिए रख लो ख़ुद से दूर,
तुम्हारी वजह से देखो मरे न कोई मजबूर।
क्यों करते हो कालाबाज़ारी तुम चीज़ों की
इससे कौन सा भगवान पा जाओगे तुम
नर सेवा ही नारायण सेवा है रट लो तुम
इस विपदा को अवसर मे मत बदलो तुम
राजेश मिश्रा
