खूनी संघर्ष में इजराइल-फिलिस्तीन आमने-सामने, क्या है विवाद की वजह?

(विशेष संकलन: रोहित कुमार): विवाद की हालिया वजह इजराइल द्वारा शेख जर्राह को खाली कराया जाना है। शेख जर्राह पूर्वी यरुशलम का इलाका है जहां से इजराइल फिलिस्तीनी परिवारों को निकालकर यहूदी लोगों को बसा रहा है। फिलिस्तीनी लोग इसी का विरोध कर रहे हैं।

पिछला शुक्रवार रमजान महीने का आखिरी शुक्रवार था। इस वजह से यरुशलम की मस्जिद अल-अक्सा में काफी तादाद में मुस्लिम लोग नमाज अदा करने इकट्ठा हुए थे। नमाज के बाद ये लोग शेख जर्राह को खाली कराए जाने के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया और इस दौरान इजराइली सेना और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प हुई।

यरुशलम में मुस्लिमों के पवित्र महीने रमजान के शुरू होने के बाद से ही इजराइली पुलिस और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प की। आम दिनों के मुकाबले रमजान में मस्जिद अल-अक्सा में आने वाले मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होती है। इजराइली पुलिस ने यरुशलम शहर के दमास्कस गेट पर बैरिकेडिंग कर दी थी। मुस्लिमों का कहना था कि ये उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को रोकने की कोशिश है। बढ़ते विरोध को देखते हुए पुलिस ने वहां से बैरिकेडिंग हटा तो दी, लेकिन माहौल बिगड़ाने में ये भी एक प्रमुख वजह रही।

विवाद की एक और वजह यरुशलम-डे को भी बताया जा रहा है। दरअसल यरुशलम-डे 1967 के अरब-इजराइल युद्ध में इजराइल की जीत के जश्न के तौर पर मनाया जाता है। इजराइल ने इस युद्ध को 6 दिन में ही जीत लिया था और पूर्वी यरुशलम पर कब्जा किया था। इस साल 10 मई को यरुशलम-डे मनाया गया।

इस दिन इजराइली लोग यरुशलम में मार्च करते हुए वेस्टर्न वॉल तक जाकर प्रार्थना करते हैं। वेस्टर्न वॉल को यहूदियों का एक पवित्र स्थल माना जाता है। इस मार्च के दौरान भी हिंसक झड़पें हुईं। 10 मई को शेख जर्राह से 4 फिलिस्तीनी परिवारों को निकाले जाने के मामले में इजराइली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी। बढ़ते विवाद को देखते हुए इसे भी टाल दिया गया है।

यरुशलम इतना विवादित क्यों है?

यरुशलम मुस्लिम, ईसाई और यहूदी तीनों धर्म मानने वाले लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। यहां अल-अक्सा मस्जिद है। मुस्लिमों का मानना है कि पैगंबर मोहम्मद मक्का से यहीं आए थे। इस मस्जिद के पास ‘डॉम ऑफ रॉक’ भी है। मुस्लिमों के अनुसार यहीं से पैगंबर मोहम्मद ने स्वर्ग की यात्रा की थी। मक्का और मदीना के बाद मुस्लिम इसे तीसरी सबसे पवित्र जगह मानते हैं।
यरुशलम में ईसाइयों का पवित्र ‘द चर्च ऑफ द होली सेपल्कर’ भी है। दुनिया भर के ईसाइयों का मानना है कि ईसा मसीह को इसी जगह पर सूली पर चढ़ाया गया था और यही वह स्थान भी है, जहां ईसा फिर से जीवित हुए थे।
यरुशलम में एक वेस्टर्न वॉल है। यहूदियों का कहना है कि यहां कभी उनका पवित्र मंदिर था और यह दीवार उसी की बची हुई निशानी है। यहीं पर यहूदियों की सबसे पवित्र जगह ‘होली ऑफ होलीज’ है। यहूदी मानते हैं कि यहीं पर इब्राहिम ने अपने बेटे इसाक की कुर्बानी दी थी। यहूदियों का ये भी मानना है कि इसी जगह से विश्व का निर्माण हुआ था।
यरुशलम तीनों धर्मों के पवित्र स्थलों के साथ-साथ विवाद की वजह भी है। 1967 के युद्ध में जीत के बाद इजराइल ने पूर्वी यरुशलम पर भी कब्जा कर लिया। इसी के बाद से इजराइल इस पूरी जगह को अपनी राजधानी मानता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इजराइल की इस बात को नहीं मानता। जबकि फिलिस्तीनी लोगों का कहना है कि फिलिस्तीन के एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बाद ये उनकी राजधानी होगी।

फिलिस्तीन की मांग क्या है?

फिलिस्तीन का कहना है, इजराइल 1967 से पहले की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक वापस लौट जाए और वेस्ट बैंक तथा गाजा पट्टी में स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र की स्थापना हो। साथ ही इजराइल पूर्वी यरुशलम से अपना दावा छोड़े, क्योंकि फिलिस्तीन आजाद होने के बाद उसे अपनी राजधानी बनाना चाहता है।

इजराइल का क्या कहना है?

फिलिस्तीन की मांगों को इजराइल सिरे से नकारता आ रहा है। इजराइल यरुशलम से अपना दावा छोड़ने को राजी नहीं है। उसका कहना है कि यरुशलम हमारी राजधानी है और ये इजराइल का अभिन्न अंग है।

दोनों के बीच किन इलाकों को लेकर विवाद है?

वेस्ट बैंक: वेस्ट बैंक इजराइल और जॉर्डन के बीच में है। इजराइल ने 1967 के युद्ध के बाद इसे अपने कब्जे में कर रखा है। इजराइल और फिलिस्तीन दोनों ही इस इलाके को अपना बताते हैं।
गाजा पट्टी: गाजा पट्टी इजराइल और मिस्र के बीच में है। यहां फिलहाल हमास का कब्जा है। ये इजराइल विरोधी समूह है। सितंबर 2005 में इजराइल ने गाजा पट्‌टी से अपनी सेना को वापस बुला लिया था। 2007 में इजराइल ने इस इलाके पर कई प्रतिबंध लगा दिए।
गोलन हाइट्स: राजनीतिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ये इलाका सीरिया का एक पठार है। 1967 के बाद से ही इस पर इजराइल का कब्जा है। इस इलाके में कब्जे के विवाद को लेकर कई बार शांति वार्ता की कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

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