ग्राउंड रिपोर्ट : कठपुतली भर हैं ग्राम पंचायत सदस्य, न निर्णय में हिस्सेदारी और न अधिकार का पता

गांव की सरकार में मंत्रियों की हैसियत से कामकाज में अहमियत रखने वाले पंचायत सदस्यों को न तो मीटिंग में बुलाया जाता है, न ही उनसे राय मांगी जाती है। उन्हें न तो अपने अधिकारों की जानकारी होती है न उनकी दिलचस्पी रहती है। यहां तक की बंद कमरों में बनने वाली करोड़ों की योजनाओं पर उनके दस्तखत भी कोई और ही कर देता है।

 

जिस तरह से सदस्य अपनी शक्तियों को लेकर जागरुक नहीं हैं, उसी तरह इनके चुनाव में बस खानापूर्ति ही की जाती है। इस बार पहले चरण नामांकन को देखें तो जहां जिला पंचायत सदस्यों और प्रधान पदों के लिए पदों से कई गुना पर्चे दाखिल हुए वहीं, पंचायत सदस्यों के नामांकन पहले चरण में कुल पदों के सापेक्ष मात्र 53% ही दाखिल हुए हैं।

 

पहले चरण में ग्राम पंचायत सदस्यों के कुल 1,86,583 पद थे जबकि 99,083 नामांकन हुए। बाकी सीटें उपचुनाव के जरिए छह माह के भीतर ही भरी
जाएंगी। 2015 के चुनावों में पंचायत सदस्यों की संख्या कुल 7,42,269 थी।

पूरे कार्यकाल में सिर्फ दो बार किए दस्तखत…
गोंडा जिले के रुपईडीह ब्लॉक के टेढ़वा गुलाम ग्राम पंचायत के निवर्तमान पंचायत सदस्य विश्राम ने पांच वर्षों में दो बार ही हस्ताक्षर किए। पहला जब प्रधान को शपथ लेना था, दूसरा पहली बैठक में। इसके बाद हस्ताक्षर कौन करता है, उन्हें नहीं पता। विश्राम बताते हैं,  पांच सालों में कभी बैठक में नहीं बुलाया गया, सारा काम प्रधान करते हैं।

टेढ़वा गुलाम ग्राम ग्रामसभा की ही पंचायत सदस्य ममता देवी को भी मीटिंग में नहीं बुलाया? वह बोलती हैं, ससुर से बात करके हमारा नाम लिख ले गए। ममता निर्विरोध चुनी थीं। सोनभद्र के घोरावल के विसुंधरी निवासी गुड्डू निवर्तमान प्रधान के सामने बोलते हैं, हम  मीटिंग में ही नहीं गए, हम लोग 15 सदस्य हैं, लेकिन पंचायत में कभी खुली मीटिंग ही नहीं हुई।

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