दिल्ली: एलजी की शक्तियां बढ़ने से बेचैन क्यों हैं केजरीवाल, क्या बिखर जाएगा आम आदमी पार्टी का यह सपना?

केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक बिल का प्रस्ताव किया, जो दिल्ली के उपराज्यपाल की शक्तियां बढ़ाने वाला होगा। इस बिल के कानून बनने के बाद दिल्ली की सरकार द्वारा कोई भी कानून बनाने के बाद उस पर एलजी की सहमति लेना अनिवार्य हो जाएगा। इस बिल के पास होने के बाद दिल्ली सरकार को राजधानी के बारे में कोई भी विशेष निर्णय लेने से पहले उपराज्यपाल से सलाह लेना अनिवार्य होगा। उपराज्यपाल की शक्तियों के बारे में केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच पहले भी टकराव होता रहा है, लेकिन नया बिल आने के बाद यह मामला एक बार फिर गहरा सकता है। अब सवाल उठता है कि उपराज्यपाल की शक्तियां बढ़ने से अरविंद केजरीवाल इतने बेचैन क्यों हैं?

टूट सकता है केजरीवाल का यह सपना
दरअसल, अरविंद केजरीवाल दिल्ली को पूरे देश में एक ‘मॉडल स्टेट’ के रूप में पेश करना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश हो या पंजाब, उत्तराखंड हो या गुजरात में सूरत का नगर निगम चुनाव, आम आदमी पार्टी ने हर जगह दिल्ली को एक मॉडल स्टेट के रूप में पेश किया। पार्टी ने जनता से कहा कि अगर वह दिल्ली की तरह मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं पाना चाहते हैं तो उन्हें अपने राज्य में भी आम आदमी पार्टी को सत्ता में लाना होगा। यानी दिल्ली में किए गए कामकाज को पार्टी पूरे देश में अपना मॉडल बताकर राष्ट्रीय राजनीति में जगह पाना चाहती है। सूरत नगर निगम में सफलता पाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने वहां की जनता को यही सपने दिखाए।

 

कांग्रेस की जगह पाने में जुटी आप
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस की जगह पाने की कोशिश कर रहे हैं। वह दिल्ली में तो जनता की पहली पसंद के रूप में स्थापित हो चुके हैं। अब उनकी निगाहें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में पार्टी के विस्तार पर हैं। आम आदमी पार्टी की लोकलुभावनी नीतियां जनता के बीच आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं, जो पार्टी के दूसरे राज्यों में उभार का कारण बन सकती हैं। अगर ऐसा होता है तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों को राजनीतिक नुकसान होने का अनुमान रहेगा।
केजरीवाल ने बताया लोकतंत्र के खिलाफ
अरविंद केजरीवाल ने इस बिल को पेश करने का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करके देख लिया कि उसे जनता वोट नहीं करती है तो दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का यह दूसरा रास्ता तैयार किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि इस बिल के पास होने के बाद दिल्ली की सत्ता का असली मालिक उपराज्यपाल होगा। ऐसे में जनता द्वारा चुनी गई दिल्ली की सरकार क्या काम करेगी?

भाजपा ने कहा- आप की सोच गलत
अरविंद केजरीवाल के विरोध पर भाजपा ने कहा कि वह अकारण ही बिल का विरोध कर रहे हैं। देश संविधान से चलता है और पुराने कानूनों में उचित समय पर सही परिवर्तन किए जाते रहे हैं। ऐसे में कुछ शक्तियों के स्पष्ट होने से दिल्ली सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वहीं, दिल्ली कांग्रेस ने इस बिल पर भाजपा और आम आदमी पार्टी के मिले खेल का परिणाम बताया। पार्टी अध्यक्ष चौधरी अनिल कुमार ने कहा है कि आम आदमी पार्टी इस बिल का उचित विरोध नहीं कर रही है और इससे साबित हो गया है कि दोनों पार्टियां मिल-जुलकर सत्ता का खेल खेल रही हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस बिल का विरोध करेगी और इसके खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था यह फैसला
बता दें कि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच एक विवाद की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल संवैधानिक प्रमुख हैं और उनकी भूमिका सीमित है। दिल्ली सरकार को उनसे रोज-रोज के कामकाज के बारे में अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। अब माना जा रहा है कि इस तरह के बिल से दिल्ली सरकार को उपराज्यपाल से बार-बार अनुमति लेने की जरूरत पड़ेगी। यह स्थिति आम आदमी पार्टी की योजनाओं को धरातल में उतारने में बाधा बन सकती है। केजरीवाल इसी स्थिति का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि यह बिल अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक सपनों की उड़ान सीमित करने की कोशिश कर सकता है।

 

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