शताब्दी काशी विद्यापीठ की : एक संस्थान जिसकी स्थापना वेद और कुरान के उच्चारण के साथ हुई

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय बुधवार (10 फरवरी) को सौ साल का हो गया। एक सदी इस संस्था ने गुजार दिए। काशी विद्यापीठ अपने शताब्दी को हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। विद्यापीठ में पूरे एक सप्ताह (10 फरवरी से 16 फरवरी) तक शताब्दी वर्ष महोत्सव मनाया जा रहा है। एक विश्वविद्यालय जिसने भारत को आजादी की लड़ाई लड़ते देखा। भारत को आजाद होते देखा। काशी विद्यापीठ महज एक शिक्षण संस्थान तो नहीं। ये इससे कहीं अधिक है। एक धरोहर है, राष्ट्रपिता के विचारों का, उनके मार्गदर्शन का। एक पोथा है, शिवप्रसाद गुप्त और भगवान दास के संघर्षों की गाथा का। एक थाती है भारतीय समाजवाद के पितामह कहे जाने वाले आचार्य नरेन्द्र देव का।

वो दौर था महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन का। ब्रिटिश हुकूमत को भारत से खदेड़ने के लिए देशभर में आंदोलन चल रहा था। गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग हो रहा था। तभी एक विचार कुछ महान लोगों के दिमाग में दस्तक देने लगी। सोच थी एक ऐसे शिक्षण संस्थान की जो पूरी तरह से भारतीय हो। यानी कि “भारतीयों का, भारतीयों के लिए और भारतीयों के द्वारा” चलाया जाने वाला संस्थान। असहयोग की भावना का ही परिणाम था यह विचार। भारतीयता को बढ़ावा देने और अंग्रेजी सरकार को भारत से विदा करने के उद्देश्य के साथ नींव पड़ी काशी विद्यापीठ की। इतिहास गवाह बन रहा था। तारीख थी 10 फरवरी, 1921 की। शुरुआत में इसका नाम काशी विद्यापीठ ही था। साल 1995 में इसे गांधी जी के नाम पर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ कर दिया गया।

जब विद्यापीठ का उद्घाटन हो रहा था तब गांधी काशी आए थे। महात्मा जी के हाथों ही इस विश्वविद्यालय का श्री गणेश हुआ। इतिहासकार बताते हैं कि जब इस विश्वविद्यालय का उद्घाटन हो रहा था तब एक साथ वेद और कुरान का पाठ हो रहा था। ये काम भारत में सामाजिक सौहार्द को बढ़ाने के उद्देश्य से किया जा रहा था। काशी विद्यापीठ अपने जन्म से ही क्रांतिकारियों की नर्सरी बन गया था। आजादी की लड़ाई लड़ रहे भारतीयों के लिए यह एक अड्डा था। यह विश्वविद्यालय चंद्रशेखर आजाद के तेवरों की गवाह और संरक्षक रही है। विश्वविद्यालय में स्थित ललित कला विभाग में आज भी चंद्रशेखर आजाद सरीखे क्रांतिकारियों का गुप्त कमरा और सुरंग मौजूद है।

काशी विद्यापीठ के पहले कुलपति बने थे भगवान दास। उनके साथ इस विश्वविद्यालय के प्रबंधन में महात्मा गांधी, शिवप्रसाद गुप्त, आचार्य नरेन्द्र देव, लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू और पुरुषोत्तम दास टंडन भी शामिल थे। विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में आज भी एक पवित्र कमरा सुरक्षित है। ये वही कमरा है जिसमें कभी भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ठहरे थे।

अपने सौ साल के अब तक के जीवन में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ने लाखों देशभक्तों को जन्मा है। अपनी समृद्ध गर्भ में हजारों विभूतियों को पाला है। काशी विद्यापीठ कुछ एकड़ में फैला सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा, कुछ इमारतें, बहुत से विभाग भर नहीं है। ये सब सिर्फ इस विश्वविद्यालय के अस्थि पंजर हैं। लेकिन सांसें कुछ और हैं। इसकी आत्मा एक सोच है। सोच वही जिसकी नींव पर यह विश्वविद्यालय खड़ा हुआ था। विविधताओं का समावेश, समानता का संदेश, भारतीय सभ्यता और संस्कृति का उपदेश, आधुनिक विकास और वैज्ञानिक सोच का समावेश। यही तो चाहते थे शिवप्रसाद गुप्त, भगवान दास, महात्मा गांधी और आचार्य नरेन्द्र देव।

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