उत्तराखंड में आई तबाही से भी बड़ा झेलना पड़ सकता है महाजलप्रलय : राजेंद्र सिंह, पर्यावरणविद

पर्यावरणविद व जलपुरुष के नाम से मशहूर मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह, उत्तराखंड में रविवार को आए जलप्रलय पर बेहद चिंतित हैं। उनकी चिंता जीवनदायिनी नदियों को सीमा में बांधने पर भी है। वह उत्तराखंड के चमोली जिले में आई तबाही की असली वजह अलकनंदा नदी पर डैम बनाने को मानते हैं। कहते हैं कि अगर सरकारें अब भी नहीं चेती तो भविष्य में महाजलप्रलय झेलना पड़ेगा। तबाही का मंजर ऐसा होगा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। अलकनंदा, मंदाकिनी व भागीरथी नदियों को आजाद रखने की जरूरत है। तीनों नदियां देवप्रयाग में मिलती हैं। इनमें वनस्पतियों का रस मिला है। जब बांध बनाकर पानी रोकेंगे तो वह सिल्ट के साथ नीचे सतह में बैठ जाएगा। जल की शक्ति खत्म हो जाएगी। ऐसे में जलप्रलय सामने होंगे। विनाश का एक मुख्य कारक यह भी है। देखिए, आज हम पर्यटन के भूखे हैं। ऐसे में तीर्थाटन को भूल गए। जबकि, तीर्थाटन से आस्था जुड़ी होती है। संवेदना होती है, जिसके चलते हम उस जगह को संरक्षित रखने के बारे में सोचते हैं। पर्यटन सिर्फ मौज-मस्ती तक सीमित है। इस अंतर को समझने की जरूरत है। इसे सिर्फ प्रकृति का गुस्सा बताने से काम नहीं चलेगा। यह गुस्सा मानव निर्मित है। विकास के दौर में सुरक्षा को भूल जाने पर इस तरह की घटनाएं होंगी। अलकनंदा, मंदाकिनी व भागीरथी नदियां भूकंप प्रभावित क्षेत्र में हैं। वहां कोई भी बड़ा निर्माण नहीं कर सकते हैं। बड़ा निर्माण करेंगे तो खामियाजा भुगतना होगा। बिहार में पुरुलिया के पास एक झील की दीवार कमजोर हो रही है। उसके फटने से भी तबाही हो सकती है।

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