मौकापरस्त नेताओं को पर्यटन से पहले समझना होगा ,दलित उत्पीड़न है एक राष्ट्रीय समस्या

विशेष संकलन: मौकापरस्त नेताओं को तीर्थ यात्रा से पहले यह समझना होगा कि दलित उत्पीड़न एक राष्ट्रीय समस्या है वर्तमान में उत्तर प्रदेश के हाथरस में जो घटना घटित हुआ है उसे लेकर हर व्यक्ति में नाराजगी है गुस्सा भी है और सभी सभ्य संवेदनशील समाज को गुस्से में रहना भी चाहिए। परंतु वर्तमान समय में जिस तरीके से हाथरस को एक पर्यटन स्थल के तौर पर कई राजनीतिक दलों के द्वारा बना दिया गया है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

जब कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी ,आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ,आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर रावण ,समाजवादी पार्टी ,बहुजन समाज पार्टी के नेता हाथरस पहुंच कर दलित उत्पीड़न का वजह सिर्फ भाजपा को बता रहे हैं तब उन्हें यह पता होना चाहिए कि दलित उत्पीड़न भाजपा शासित राज्यों की समस्या सिर्फ नहीं है वर्तमान समय में ही केरल के त्रिवेंद्रम ,पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर, बिहार के गया, राजस्थान के बारां सहित देश के कई हिस्सों में घटना घटित हुआ है ,परंतु मौकापरस्त नेताओं के वोट बैंक और चेहरा चमकाने के राजनीति में फिट नहीं बैठता है ।देश के अन्य हिस्सों में होने वाली घटनाएं इसलिए उसके बारे में बात तक नहीं करते हैं।

यह सवाल नेताओं के साथ-साथ मीडिया और खासकर टीवी चैनलों के समक्ष भी है। टीवी चैनलों के पास तो इस सवाल का सीधा और बहुत सरल सा जवाब यह होगा कि वे तो टीआरपी की तलाश में रहते हैं और उसके लिए कहीं भी जा सकते हैं? विचार करें कि नेता या फिर राजनीतिक दल ऐसे किसी सवाल के जवाब में क्या कह सकते हैं? उनकी ओर से एक आसान जवाब तो यह हो सकता है कि उनकी संवेदना उन्हें ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित करती है। वे यह भी कह सकते हैं कि यह तो हम ही तय करेंगे कि किस मामले में हमारी संवेदना जगेगी और किसमें नहीं?

 

मौकापरस्त नेता संदेश देना चाहते हैं कि हम ही हैं दलित और पीड़ित परिवार के सच्चे हितैषी

वे ऐसा भी कोई जवाब दे सकते हैं कि मेरी मर्जी-ठीक वैसे ही जैसे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अभी हाल में दिल्ली में अपने कार्यकर्ताओं की ओर से ट्रैक्टर जलाने पर कहा था कि मेरा ट्रैक्टर, मैं जो चाहे वह करूं! जो जवाब वह नहीं देंगे या नहीं देना चाहेंगे, वह यह होगा कि दरअसल हमारा मकसद तो केवल मौके का फायदा उठाना, प्रचार पाना और देश को यह संदेश देना होता है कि हम ही हैं दलित, वंचित या पीड़ित परिवार के सच्चे हितैषी।

मौकापरस्त राजनीति की है पराकाष्ठा

नि:संदेह कोई यह तय नहीं कर सकता कि किसी की संवेदना किस मामले में जगे और किसमें नहीं, लेकिन यह मौकापरस्त राजनीति की पराकाष्ठा है कि संवेदना व्यक्त करने का काम सिर्फ इस आधार किया जाए कि पीड़ित और आरोपित कौन है और घटना किस दल के शासन वाले राज्य में हुई है? यह शुद्ध गिद्ध राजनीति है। हाल के समय में राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों की ओर से संवेदना के प्रकटीकरण का जैसा जातीय और सांप्रदायीकरण किया गया है, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है।

 

 

विषाक्त मानसिकता पर नहीं हो पा रहा है प्रहार

इस घनघोर मौकापरस्त राजनीति का नतीजा यह है कि उस विषाक्त मानसिकता पर प्रहार हो ही नहीं पा रहा, जिसके चलते ऐसी घटनाएं होती हैं। राजनीतिक दलों के लिए दलित उत्पीड़न के मामले में ऐसा मनमाना निष्कर्ष निकाला जाना तो बहुत आसान है कि शासन- प्रशासन संवेदनशील नहीं, लेकिन यह समस्या का सरलीकरण है, क्योंकि इस तरह की घटनाओं के मूल में तो समाज की वह मानसिकता है, जिसके चलते दलित, वंचित समूहों को नीची निगाह से देखा जाता है और वे अन्याय का शिकार बनते हैं। जब जरूरत इस मानसिकता को भी खास तौर पर निशाने पर लेने की है, तब यह बताने की कोशिश की जाती है कि सत्तारूढ़ दल अथवा उसका प्रशासन दलितों के हित की चिंता नहीं कर रहा है। इसे साबित करने में मीडिया का एक हिस्सा भी अतिरिक्त मेहनत करता है।

दलित उत्पीड़न  गंभीर राष्ट्रीय समस्या

हाथरस कांड सभ्य समाज को शर्मिंदा और साथ ही यह बयान करने वाला है कि किस तरह दलित समुदाय अब भी अत्याचार का शिकार हो रहा है, लेकिन यह देखना दयनीय है कि राजनीतिक दलों का सारा जोर यह साबित करने पर है कि यह खौफनाक घटना तो इसलिए घटी कि उत्तर प्रदेश में भाजपा शासन में है। इस तरह का निष्कर्ष निकालने वालों पर किसी का बस नहीं, लेकिन यह ध्यान रहे तो बेहतर कि दलित उत्पीड़न एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े यह स्पष्ट भी कर रहे हैं, लेकिन पक्ष-विपक्ष के दलों को तो अपने एजेंडे के हिसाब से ही नतीजे पर पहुंचना है। जब तक ऐसी गंदी और घटिया राजनीति होती रहेगी और तथाकथित संवेदना के टुकड़े-टुकड़े किए जाते रहेंगे, तब तक दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर लगाम लगने वाला नहीं है, भले ही कानूनों को कितना भी कठोर क्यों न बना दिया जाए? कोई इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि देश को दहलाने वाले दिल्ली के निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म रोधी कानून हद से ज्यादा कठोर कर दिए गए और फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात वाला है।

भाजपा पर सवाल उठाने से पहले जानना चाहिए

भाजपा पर सवाल उठाने से पहले लोगों को जानना चाहिए कि देश में आरक्षित सीटें 131 हैं , 84 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं जिसमें 46 सांसद भाजपा से चुनकर आए हैं ,वहीं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 31 सांसद भाजपा से जीत कर आए हैं। उत्तर प्रदेश में भी सबसे अधिक प्रतिनिधित्व का अवसर भारतीय जनता पार्टी  देने का कार्य किया है। भाजपा देश की एकमात्र ऐसी संगठन है जिसका अनुसूचित जाति जनजाति मोर्चा हर एक मंडल स्तर तक गठित है।

विशेष संकलनकर्ता :

चेतन वशिष्ठ भाजपा युवा मोर्चा नेता पूर्व प्रांत संयोजक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद।

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