डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक व्यक्ति नहीं विचार का नाम है :चेतन
स्मृति विशेष: आज 23 जून को पूरे देश में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद करते हुए स्मृति दिवस मनाया जा रहा है आज के दिन ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन जम्मू कश्मीर में हुआ था.यह वर्ष इसलिए भी यादगार है क्योंकि 2019 अगस्त में जम्मू कश्मीर से धारा 370 के सभी प्रावधानों को निष्क्रिय कर दिया गया है. स्मृति दिवस के मौके पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद करते हुए चेतन वशिष्ट भाजपा युवा मोर्चा कार्यकर्ता ने कहा कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि विचार का नाम है. चेतन वशिष्ठ ने ग्रेनोन्यूज संवाददाताओं से बातचीत में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन के बारे में विस्तार से बातचीत के दौरान बताया.

डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी एक सच्चे राष्ट्रभक्त और राष्ट्रनेता थे । भारतीय हिन्दू संस्कृति में उनकी अटूट आस्था थी । यह कहना गलत होगा कि वे अन्य सम्प्रदाय व जाति के विरोधी थे । वे सच्चे भारतीय थे । भारतीयता की रक्षा ही उनके जीवन का सिद्धान्त था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया ।
भारतीय राजनीति में हमेशा याद किए जाएंगे
डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सन् 1939 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश लिया । वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए । वीर सावरकर की हिन्दू महासभा की विचारधारा से प्रभावित होकर इसकी सदस्यता भी ग्रहण की । वे हिन्दुओं की उपेक्षा तथा मुसलमानों की अत्यधिक सुरक्षा को लेकर चिन्तित रहा करते थे । उन्हें भय था कि उन्हीं नीतियों के फलस्वरूप एक दिन बंगाल को पाकिस्तान का रूप मिल जायेगा ।
उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत से पृथक् न होने देने हेतु पटेल की तरह ही अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी । स्वतन्त्रता के बाद वे नेहरू मन्त्रिमण्डल में वाणिज्य मन्त्री के पद पर रहे । उस पद पर रहते हुए उन्होंने चितरंजन रेलवे इंजन का कारखाना, सिंदरी बिहार की खाद फैक्ट्री, समुद्री जहाज निर्माण के कारखानों के निर्माण हेतु अपना अनथक श्रम व शक्ति लगा दी ।
स्त्री शिक्षा, सैनिक शिक्षा, योग और आध्यात्म की शिक्षा, टीचर्स ट्रेनिंग हेतु उन्होंने पर्याप्त प्रयास किये । नेहरूजी के विरोध के बाद भी बिना परमिट के कश्मीर जाने का निश्चय उनकी दबंग, निर्भीक प्रवृत्ति का सशक्त उदाहरण है । वे दिल्ली से जम्मू के रास्ते जितने भी शहरों से गुजरे, लाखों की भीड़ ने उनका स्वागत हृदय से किया ।
उन्होंने अपनी सभी सभाओं में यह निडरता के साथ कहा कि- ”नेहरूजी एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान को पहले ही भेंट कर चुके हैं । मैं एक इंच भारत की भूमि किसी दूसरे के हाथ नहीं जाने दूंगा ।” सन् 1953 में पब्लिक सेप्टी एक्ट के तहत उन्हें बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया गया था । नेहरूजी के लियाकत अली पैक्ट का जब उन्होंने 1950 में विरोध किया था, जिसमें हिन्दुओं पर किये गये अत्याचार के प्रति गहरा आक्रोश छिपा था, उन पर इस हेतु साम्प्रदायिक होने का इल्जाम मढ़ दिया गया ।
आक्रोशित होकर मुखर्जी द्वारा दिये गये त्यागपत्र को नेहरूजी ने स्वीकार कर लिया । 28 अप्रैल 1951 को भारतीय जनसंघ का गठन करते हुए उन्होंने यह कहा कि- ”स्वतन्त्रता और एकता के स्थायित्व के लिए तथा जन्मभूमि की रक्षा के लिए, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावना के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनसंघ का गठन किया जा रहा है । यह दल किसी सम्प्रदाय या जाति का विरोधी नहीं है ।”
प्रथम आम चुनाव में श्री मुखर्जी विपक्षी दल से दक्षिण कलकत्ता क्षेत्र से भारी बहुमत से विजयी होकर लोकसभा में पहुंचे । एक सशक्त विपक्षी की भूमिका में उन्होंने कांग्रेस की दुर्बल एवं तुष्टीकरण की नीति का हमेशा विरोध किया ।
