के ज़िन्दगी महँगी नही है हमने बना दिया था ……
के ज़िन्दगी महँगी नही है हमने बना दिया था,
अन्न महंगा नही है हमने, भूख को ब्रैंड बना लिया था।

सिनेमा मल्टीप्लेक्स के बिना भी हम जी सकते है,
संग घर मे लूडो कैरम खेल, दिल बहला सकते है।
दाल चावल से मुँह बिचका फास्टफूड खाते थे
भूल गए थे कि भूख रोटी चावल से भी मिटा सकते हैं।
के ज़िन्दगी महँगी नही थी हमने बना दिया था,
अन्न महंगा नही है हमने भूख को ब्रैंड बना लिया था।
शॉपिंग करना नेसेसरी था ब्रांड्स पहनना ज़रूरी था,
भ्रम था हमारा क्योंकि कपड़ा तो दो ही सेट ज़रूरी था।
घरों से दूर हो गए थे ज़्यादा से ज़्यादा नोट कमाने को
घर से ही दूर सुकूँ है हमने ये भ्रम पाल लिया था।
के ज़िन्दगी महँगी नही है हमने बना दिया था,
अन्न महंगा नही है हमने भूख को ब्रैंड बना लिया था।
गाँव से दूर शहर मे बसने को गाँव बेच दिया था,
पक्के मकान की चाहत मे कच्चा तोड़ दिया था।
अपनी जड़ों से दूर निकल आये थे कई साल पहले
न मालूम क्यों हम सब ने जिला जवार छोड़ दिया था।
के ज़िन्दगी महँगी नही है हमने बना दिया था,
अन्न महंगा नही है हमने भूख को ब्रैंड बना लिया था।
नेचर से भी बड़े हम इंसान है ऐसा सोचने लगे थे,
अंधी इस दौड़ मे हम नेचर को ही ख़त्म करने लगे थे।
इस धरती पे सबका हक़ है इंसान भूलने लगा था,
इंसान जीव जंतुओं को खा के विनाश करने लगा था।
के जीवन इतना भी कठिन नही हमने बना लिया था
हमसे कोई बड़ा नही ,इस सोच को हमने बैठा लिया था।
के ज़िन्दगी महँगी नही है हमने बना दिया था,
अन्न महंगा नही है हमने भूख को ब्रैंड बना लिया था।
राजेश मिश्रा
