सुरेंद्र नागर सियासी खेलों के महारथी तो नहीं !

ग्रेटर नोएडा (रोहित कुमार):राज्यसभा सांसद बनने के बाद आज सुरेंद्र नागर अपने गृह क्षेत्र में आए. स्थानीय जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया.

उल्लेखनीय है कि 10 अगस्त को सुरेंद्र नागर भाजपा में शामिल हुए थे .सुरेंद्र नागर ने कहा कि “राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , माननीय गृह मंत्री अमित शाह के मूल मंत्र सबका साथ सबका विकास को आत्मसात किया “.

वही उल्लेखनीय है कि सुरेंद्र नागर समाजवादी पार्टी के टिकट पर 2016 में राज्यसभा में पहुंचे थे .

सुरेंद्र नागर ने पिछले महीने राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना इस्तीफा सौंप दिए थे. उसके बाद भाजपा में शामिल हुए और भाजपा ने उन्हें दोबारा उत्तर प्रदेश कोटे से राज्यसभा सदस्य के रूप में नामित किया और दोबारा से सुरेंद्र नगर राज्यसभा सदस्य बन चुके हैं.

सुरेंद्र नागर के राजनीतिक जीवन

सुरेंद्र नागर के राजनीतिक जीवन को देखें तो 1998 में व्वे स्थानीय निकाय क्षेत्र से एमएलसी बने थे निर्दलीय उसके बाद 2004 में भी रहे और जब गौतमबुधनगर संसदीय क्षेत्र बना तब 2009 में सुरेंद्र नगर गौतम बुध नगर से सांसद बने और उस समय सुरेंद्र नगर बसपा के टिकट पर लोकसभा में पहुंचे थे.

उसके बाद सुरेंद्र नागर 2016 में समाजवादी पार्टी का दामन थामा और राज्यसभा में पहुंचे.

अभी हाल ही में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और दोबारा से राज्यसभा में पहुंचे हैं .

उनके इस राजनीतिक सफर से यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के राजनीति में जो अहम राजनीतिक दल हैं उन सभी दलों का दामन थाम चुके हैं. माना जाता है कि सुरेंद्र नागर का गुर्जर समुदाय पर विशेष प्रभाव है, लेकिन अब सवाल यह है कि यदि किसी समुदाय विशेष पर किसी नेता का विशेष प्रभाव होता है तो क्या दल बदलने के साथ-साथ उस समुदाय का दिल भी उस दल के साथ जुड़ जाता है.आने वाले समय में ही यह स्पष्ट होगा कि क्या इसका फायदा उस राजनीतिक दल को मिलेगा जिस दल में किसी समुदाय विशेष में विशेष प्रभाव रखने वाले लोग जुड़ते जा रहे हैं. वहीं अगर मौजूदा हालात में बात करें तो भारतीय जनता पार्टी जिस तरीके से अपने जनाधार को मजबूत किया है. उसी रफ्तार से दूसरे दलों को छोड़कर लोग भाजपा में शामिल हो रहे हैं लेकिन कहीं ना कहीं भाजपा की जो विश्वसनीयता है उस पर भी सवाल उठेगी क्योंकि जो नेता दूसरे दल में रहे हैं उनकी कार्यप्रणाली अलग रही है स्वभाविक रूप से लेकिन आज जब वह भाजपा में शामिल होते हैं तो भाजपा क्या उन्हें अपनी स्वाभाविक विचारधारा को समझा पाएगी या सिखा पाएगी ?? भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

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