क्या चिदम्बरम की गिरफ्तारी से कांग्रेस के पापों का घड़ा फूटेगा?

नोएडा( चन्द्रपाल प्रजापति):
भारत में जनप्रतिनिधियों के बारे में एक प्रचलित राय है- नेताओं को नौकरशाह चलाते हैं। योग्य असरदार नेताओं की कमी से जुड़ी यह धारणा पी. चिदंबरम ने तोड़ दी है। जिन्होंने अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए बहुत ही घ्रणित कार्य किये। गृहमंत्री रहते हुए उन्होंने आतंकवादी इशरत जहाँ पर इनका प्रेम से सब साफ हो जाता है जो तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने के लिए अपने आतंकी दोस्तों के साथ निकली थी। राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगाने वालों के प्रति गृह मंत्री रहते हुए “संवेदनशीलता” दिखाने वाले चिदंबरम पर दूसरा आरोप वित्त मंत्री रहते हुए अपने बेटे कार्ति की कंपनियों को “परोक्ष” लाभ पहुंचाने का है।

उल्लेखनीय है कि आईएनएक्स मीडिया मामले में चिदंबरम पर भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के 305 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग लेने के लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड की मंजूरी में अनियमितताओं के आरोप हैं। चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री रहते हुए रिश्वत लेकर आईएनएक्स को 2007 में 305 करोड़ रु. लेने के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड से मंजूरी दिलाई थी। जिन कंपनियों को फायदा हुआ, उन्हें चिदंबरम के सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम चलाते हैं। एयरसेल-मैक्सिस डील में भी चिदंबरम आरोपी हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने भी चिदंबरम के खिलाफ देश से बाहर चले जाने के डर से लुकआउट नोटिस जारी किया है। विजय माल्या के फरार होने के बाद चिल्ला—चिल्ला कर भाजपा को घेरने वाले पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम लापता होने के बाद बड़े ही नाट्यकर्म ढंग से गिरफ्तार हुए हैं।

इशरत के लिए अकारण उपजा प्रेम था या नरेंद्र मोदी के लिए राजनैतिक कारणों से पैदा हुई घृणा? तत्कलीन गृह मंत्री ने किसके कहने पर वह काम किया जिस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं? लश्कर का मुखपत्र कहा जाने वाला “गजवा टाइम्स” पहले इशरत को “शहीद ” बताते हुए सलाम करता है। बाद में करतूत के तार छिपाने के लिए वेबसाइट से खबर हटाकर मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करता है। गृह मंत्रालय का हलफनामा पहले इशरत के लश्कर संबंधों की पुष्टि करता है। बाद में अज्ञात कारणों से गृह मंत्री के कहने पर उसे बदलवा दिया जाता है और इस तरह “आतंकी सूत्रों” की बात पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है? यह सिर्फ संयोग है या साजिश!! तब की सरकार और लश्कर के रुख में ऐसी समानता कैसे हो सकती है? किसका हित सध रहा था? देशहित कहां था?

इनके कारनामों की चैन यहीं नही रूकती है अगर हम फ्लैशबैक में जाकर अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि केंद्र सरकार में गृह और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके पलानी अप्पन चिदंबरम ने अपने और कांग्रेस पार्टी के निजी हित के लिए क्या क्या कार्य नही किये चाहे वो देश हित में हो न हो। कहते हैं, इनसान को अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। यह बात कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदबंरम के मामले में सच साबित हो रही है। देश को छलने वाली राजनीतिक शत्रुता और पुत्र मोह में नैतिकता को ताक पर रख देने के आरोप गहरे हैं। क्या चिदंबरम अपनी साख को इस गहराई से उठाकर फिर स्थापित कर सकेंगे?

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