आजादी से अब तक के कांग्रेस अध्यक्षों का सफर और अब नई सियासत की संभावना

ग्रेटर नोएडा(रोहित कुमार):राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव 2019 की हार की जिम्मेवारी लेते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया है.उन्होंने अपने इस्तीफा दिए हुए पत्र को जब सोशल मीडिया के माध्यम से साझा किया तो यह स्पष्ट रूप से निकल कर आया कि राहुल गांधी कांग्रेस की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत परिवर्तन की वकालत कर रहे हैं,साथ ही उस पत्र के माध्यम से राहुल गांधी ने कांग्रेस की सकारात्मक और धर्मनिरपेक्ष भावना को भी व्यक्त किया है.वहीं राहुल गांधी ने जमकर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा है आज हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि भारत के आजादी के बाद से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन कौन हुए हैं :

1947: देश आजाद हुआ तो 1947 में जेबी कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें मेरठ में कांग्रेस के अधिवेशन में यह जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें महात्मा गांधी के भरोसेमंद व्यक्तियों में माना जाता था।

1948-49 : इस दौरान कांग्रेस की कमान पट्टाभि सीतारमैया के पास रही। जयपुर कांफ्रेंस की उन्होंने अध्यक्षता की।

1950: इस वर्ष पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष बने। नासिक अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की। यह पुरुषोत्तम दास टंडन ही थे, जिन्होंने हिंदी को आधिकारिक भाषा देने की मांग की।

1955 से 1959: यूएन ढेबर इस बीच कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने अमृतसर, इंदौर, गुवाहाटी और नागपुर के अधिवेशनों की अध्यक्षता की। 1959 में इंदिरा गांधी अध्यक्ष बनीं।

1960-1963: नीलम संजीव रेड्डी इस दरम्यान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने बंगलूरु, भावनगर और पटना के अधिवेशनों की अध्यक्षता की। बाद में नीलम संजीव रेड्डी देश के छठे राष्ट्रपति हुए।

1964-1967: इस दौरान भारतीय राजनीति में किंगमेकर कहे जाने वाले के कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। उन्होंने भुबनेश्वर, दुर्गापुर और जयपुर के अधिवेशन की अध्यक्षता की। कहा जाता है कि यह के कामराज ही थे, जिन्होंने पं. नेहरू की मौत के बाद लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने में अहम भूमिका निभाई।

1968-1969: एस. निजलिंगप्पा ने 1968 से 1969 तक कांग्रेस की अध्यक्षता की। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।

1970-71: बाबू जगजीवन राम 1970-71 के बीच कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। इससे पहले 1946 में बनी नेहरू की अंतरिम सरकार में वह सबसे नौजवान मंत्री रह चुके थे।

1972-74: शंकर दयाल शर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। नीलम संजीव रेड्डी के बाद शंकर दयाल शर्मा दूसरे अध्यक्ष रहे, जिन्हें बाद में राष्ट्रपति बनने का मौका मिला।

1975-77: देवकांत बरुआ कांग्रेस के अध्यक्ष बने। यह इमरजेंसी का दौर था। देवकांत बरुआ ने ही इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का चर्चित नारा दिया था।

1977-78: इस दौरान ब्रह्मनंद रेड्डी कांग्रेस के अध्यक्ष बने। बाद में कांग्रेस का विभाजन हो गया। जिसके बाद इंदिरा गांधी कांग्रेस (आई) की अध्यक्ष बनी। वह 1984 में मृत्यु तक पद पर रहीं। उसके बाद 1985 से 1991 तक उनके बेटे राजीव गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।

1992-96: राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव 1992-96 के बीच कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में ही देश में उदारीकरण की नींव पड़ी थी।

1996-98: सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष बने। वह 1996-1998 तक इस पद पर रहे। सीताराम केसरी का विवादों से भी नाता रहा।

1998 से 2017 तक सबसे लंबे समय तक सोनिया गांधी अध्यक्ष रहीं। फिर राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने, जिन्होंने लंबे समय तक अपने रुख को स्पष्ट करने के बाद 3 जुलाई, 2019 को आधिकारिक रूप से अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

जब एक नजर हम राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची पर डालते हैं तो यह स्पष्ट रूप से निकल कर आता है कि राहुल गांधी ने जब इस्तीफा दिया है तो कांग्रेस के लिए आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करने का उचित समय आ गया है.अब यदि इस मुकाम से कांग्रेस अपनी आंतरिक लोकतंत्र को बचाने में सफल हो पाती है तो भारत के आम लोगों को एक मजबूत संवाद करने वाला उनकी आवाज उठाने वाला एक संगठन मौजूदा हालात में देखने को मिलेगा लेकिन उसके लिए यह भी समझना जरूरी है कि यदि कांग्रेस की मौजूदा सीडब्ल्यूसी ही तय करेगी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होंगे तो निश्चित रूप से जो कांग्रेस की एक विरासत रही है उस पर दोबारा से सवाल खड़े होंगे अगर आम लोगों की चर्चा को समझने का प्रयास करें तो हम पाते हैं कि समय के साथ देश की राजनीतिक प्रक्रिया और आम मतदाताओं की सोचने की तरीका काफी बदल चुकी है वहीं अगर सामाजिक उत्थान की बात करें तो आज हर जाति धर्म के लोगों ने कहीं ना कहीं अलग सोच को अपनाना शुरू कर दिया है लेकिन आज भी जो भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक दल है कांग्रेस उस पर लोगों का यह आरोप होता है कि पुराने तरीकों को ही अपना कर चुनावी जंग में जीत हासिल करने का प्रयास करते हैं तो इस बदलते वक्त में जहां आम मतदाता और आम नागरिक अपना तौर तरीका बदल चुका है ठीक उसी तरीके से चमक-दमक से दूर एक संघर्षशील नेता जो कि आम जनता के आवाज को सड़क से सदन तक उनकी भाषा में पहुंचा सके इस तरीके के नेता का तलाश है भारत के आम लोगों को ताकि आम लोगों की आवाज विपक्ष में इस तरीके से गूंजे की मौजूदा सरकार जो कि पूर्ण बहुमत में है उसे तानाशाही दिखाने का कोई भी मौका ना मिले तो इस तरीके से हम यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि राहुल गांधी का इस्तीफा कांग्रेस के लिए एक नई सियासत की बेहतर संभावना है.

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