संस्कार, सृजन और लयात्मक नवाचार के संवाहक: डॉ. विनोद ‘प्रसून’

व्यक्तित्व / शख्सियत
विशेष रिपोर्ट

हिंदी को महज एक किताबी विषय न मानकर उसे जीवन-मूल्यों, संस्कारों, चरित्र-निर्माण और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने वाले शिक्षाविद, साहित्यकार एवं वरिष्ठ संसाधक डॉ. विनोद ‘प्रसून’ हिंदी शिक्षण में अपने अभिनव प्रयोगों के माध्यम से अलग पहचान बना रहे हैं। उनका मानना है कि “भाषा शिक्षण का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना या प्रश्नोत्तर तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि यह जीवन को गढ़ने वाले संस्कारों का पावन अनुष्ठान है।” इसी सोच के साथ वे पिछले तीन दशकों से अध्यापन, सृजनात्मक लेखन और शिक्षक-प्रशिक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

वर्तमान में दिल्ली पब्लिक स्कूल, ग्रेटर नोएडा में हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में दायित्व निभा रहे डॉ. प्रसून का शिक्षण-दर्शन ‘अपन सूत्र’—अपनत्व, प्रेरणा और नवीन प्रयोग तथा ‘पढ़ो और पढ़ाओ’ की अवधारणा पर आधारित है। यह दृष्टिकोण देश-विदेश में हिंदी शिक्षण से जुड़े अनेक शिक्षकों के लिए मार्गदर्शक बना है।

कठिन व्याकरण को गीतों में ढालने का प्रयोग

डॉ. प्रसून ने प्रायः कठिन समझे जाने वाले हिंदी व्याकरण को लयात्मक, सरस और सहज बनाने के लिए ‘अवधारणा गीतों’ की अनूठी पहल की। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण, निपात, समास, पदबंध और वाक्य रचना जैसे विषयों पर तैयार उनके अवधारणा गीत विद्यार्थियों को कठिन नियमों को गाते-गुनगुनाते और खेल-खेल में समझने का अवसर देते हैं।

‘ड़-ढ़’, ‘श-ष-स’ तथा ‘कि-की’ के सूक्ष्म अंतर, ‘र’ के विभिन्न रूप, वर्णमाला एवं मात्रा गीत, ‘ऋ की पाती’, नुक्ता गीत, सुलेखन संस्कार, कथात्मक कविताएं और संस्कार गीत उनके प्रयोगों की विशेष पहचान हैं। “सरस, सरल मनोहारी है। अपनी हिंदी प्यारी है॥” जैसे प्रयोग हिंदी को विद्यार्थियों के लिए सहज और रोचक बनाने की उनकी सोच को सामने रखते हैं। इन्हीं नवाचारों के कारण शिक्षा-जगत में उन्हें ‘लयात्मक नवाचार का प्रणेता’ भी कहा जाता है।

राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़ाव

डॉ. प्रसून की विषय विशेषज्ञता का दायरा विद्यालयी कक्षाओं तक सीमित नहीं है। वे सीआईईटी-एनसीईआरटी, सीबीएसई, सीओई और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) जैसी संस्थाओं से विषय विशेषज्ञ के रूप में जुड़े रहे हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत तैयार एनसीईआरटी की कक्षा 1 और 2 की नई पाठ्यपुस्तक ‘सारंगी’ एवं शिक्षक मार्गदर्शिका तथा कक्षा 9 (हिंदी-तृतीय भाषा) की ‘रेवा’ अधिगम एवं अभ्यास सामग्री की निर्माण समिति में भी उन्होंने सदस्य के रूप में योगदान दिया।

आवाज से डिजिटल शिक्षा तक

अकादमिक लेखन और प्रशिक्षण के साथ डॉ. प्रसून ने अपनी प्रभावशाली आवाज के माध्यम से डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में भी योगदान दिया है। सीआईईटी-एनसीईआरटी के लिए उन्होंने कक्षा 9 की ‘गंगा’, कक्षा 4 की ‘खेल योग’ और ‘कृति’ आदि की ऑडियो बुक्स को स्वर दिया है। कक्षा 4 से 9 तक के विभिन्न पाठों के वीडियो लेक्चर्स में भी उनकी प्रस्तुति रही है।

कक्षा 6 के विद्यार्थियों के लिए सीआईईटी-एनसीईआरटी द्वारा महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल पर बनाई गई लघु फिल्म ‘मेरी माँ’ में उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल के पिता की भूमिका निभाकर अभिनय-कौशल का परिचय दिया।

इसके अलावा महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल (बालभारती), पुणे के बोर्ड ऑफ स्टडीज के भाषा प्रकोष्ठ को भी उन्होंने भाषा विशेषज्ञ के रूप में मार्गदर्शन प्रदान किया है।

लाखों विद्यार्थियों तक पहुंची पाठ्यपुस्तकें

स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. प्रसून द्वारा रचित पाठ्यपुस्तक शृंखलाओं में ‘उन्मेष’, ‘उद्गम’, ‘प्रभाती’, ‘सार्थक हिंदी व्याकरण’ (कक्षा 1–10) और ‘मनोरम हिंदी व्याकरण’ (कक्षा 1–8) प्रमुख हैं। न्यू सरस्वती हाउस, नई दिल्ली से प्रकाशित इन पुस्तकों के माध्यम से देशभर में बड़ी संख्या में विद्यार्थी हिंदी भाषा और व्याकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

साहित्य में भी विशिष्ट पहचान

शिक्षक और विषय विशेषज्ञ के साथ डॉ. प्रसून एक संवेदनशील साहित्यकार के रूप में भी अपनी पहचान रखते हैं। वर्ष 1994 से आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न साहित्यिक मंचों से जुड़े डॉ. प्रसून की प्रमुख कृतियों में ‘प्रणय-प्रसून’ गीत संग्रह, ‘अक्कड़-बक्कड़’ बालगीत संग्रह और ‘मेरे उसके बीच’ ग़ज़ल संग्रह शामिल हैं।

हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए वे लगातार कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़े रहे हैं। अब तक देश-विदेश में 500 से अधिक हिंदी कार्यशालाओं तथा सीबीएसई और सीओई के माध्यम से 100 से अधिक वेबिनार एवं संगोष्ठियों का संचालन कर चुके हैं।

राजभाषा संवर्धन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। आकाशवाणी, दिल्ली के विशेष निमंत्रण पर उन्होंने समाचार सेवा प्रभाग सहित विभिन्न महत्त्वपूर्ण विभागों के लिए राजभाषा हिंदी संवर्धन कार्यशालाओं का संचालन किया है।

सम्मान और निरंतर हिंदी साधना

डॉ. विनोद ‘प्रसून’ की शैक्षणिक निष्ठा, साहित्यिक योगदान, नवाचार और हिंदी के प्रति समर्पण के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें ‘साहित्य श्री’, ‘स्टार रिसोर्स पर्सन अवॉर्ड’, ‘सरस्वती शिक्षक सम्मान’, ‘साहित्य सेवी सम्मान’, ‘प्रतिष्ठित लेखक सम्मान (स्कूली शिक्षा)’ तथा हाल में प्राप्त ‘राष्ट्रीय ज्ञान कीर्ति विभूषण सम्मान’ प्रमुख हैं।

डॉ. विनोद ‘प्रसून’ का जीवन और कार्य इस बात का उदाहरण है कि जब शिक्षा में निष्ठा, अपनत्व और नवीन प्रयोग का संगम होता है तो भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रहती, बल्कि संस्कार, संवेदना और चरित्र-निर्माण का प्रभावी माध्यम बन जाती है।

हिंदी शिक्षण में उनके प्रयोग विद्यार्थियों के लिए सीखने को सहज और आनंददायक बना रहे हैं, तो शिक्षकों के लिए नई राहें खोल रहे हैं। अध्यापन, साहित्य, प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षा और भाषा-संवर्धन के विभिन्न आयामों में सक्रिय डॉ. प्रसून अपनी निरंतर हिंदी साधना के माध्यम से शिक्षा-जगत में नवाचार की एक अलग पहचान कायम कर रहे हैं।

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