13 वर्षों से कार्यरत जिम्स के आउटसोर्स कर्मचारियों ने उठाई नियमितीकरण की मांग,कर्मचारियों की नौकरी पर कोई खतरा नहीं : निदेशक GIMS
ग्रेटर नोएडा। राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में पिछले लगभग 13 वर्षों से कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों एवं प्रशिक्षुओं ने रोजगार सुरक्षा और नियमितीकरण की मांग को लेकर आवाज बुलंद की है। कर्मचारियों का कहना है कि कोविड-19 महामारी सहित हर कठिन दौर में उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ सेवाएं दीं, लेकिन उनके भविष्य को लेकर अब तक कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई है।
कर्मचारियों का आरोप है कि संस्थान में हाल ही में शुरू की गई नई भर्ती प्रक्रिया से उनके रोजगार पर संकट उत्पन्न हो गया है। उनका कहना है कि वर्षों के अनुभव और संस्थान के प्रति योगदान को देखते हुए उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा उनकी नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो वे 15 जून 2026 से जिम्स परिसर के बाहर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे।
वहीं, जिम्स के निदेशक डॉ. ब्रिगेडियर राकेश गुप्ता ने कर्मचारियों की आशंकाओं को निराधार बताते हुए कहा कि संस्थान में बाह्य सेवा प्रदाता के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों की नौकरी पर कोई खतरा नहीं है। उन्होंने बताया कि शासन द्वारा गैर-शैक्षणिक संवर्ग के 1143 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में इन पदों पर कोई नियमित कर्मचारी कार्यरत नहीं है।
निदेशक के अनुसार, कर्मचारियों द्वारा 10 जून और 12 जून 2026 को दिए गए ज्ञापनों में बिना परीक्षा के नियमितीकरण की मांग की गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्थान द्वारा जिन पदों पर भर्ती निकाली जा रही है, उनकी संख्या उपलब्ध रिक्त पदों से भी कम रखी गई है ताकि वर्तमान में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
उन्होंने कहा कि संस्थान में कार्य का दबाव लगातार बढ़ रहा है, इसलिए भर्ती प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक है। जिम्स प्रशासन ने दोबारा आश्वस्त किया है कि आउटसोर्स कर्मचारियों को कार्य से पृथक करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है और वे पूर्ववत कार्य करते रहेंगे।
जिम्स प्रशासन ने यह भी बताया कि वर्तमान में संस्थान में लगभग 481 मरीज भर्ती हैं, जिनमें 60 से अधिक मरीज आईसीयू में तथा 10 मरीज वेंटिलेटर पर उपचाराधीन हैं। ऐसे में सभी कर्मचारियों से अपेक्षा की गई है कि मरीजों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए कोई ऐसा कदम न उठाएं जिससे उपचार कार्य प्रभावित हो या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचे।
इस पूरे मामले में अब कर्मचारियों और प्रशासन के बीच संवाद एवं समाधान की दिशा में होने वाली आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
