समरस समाज के नेता थे डॉ़ भीमराव अम्बेडकर।

चन्द्रपाल प्रजापति(नोएडा) डॉ़ अम्बेडकर केवल दलित नेता नहीं थे। यह ठीक है कि उनके जीवन की प्रमुख चिन्ता और संघर्ष अछूत कहे जाने वाले लोगों को मान-सम्मान दिलाना रहा था। मगर उनके कार्य इसी तक सीमित नहीं थे। उनके विचार-फलक में केवल अछूतों की अवस्था और उनके लिए उपाय मात्र नहीं थे। वे स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं में भी सर्वप्रमुख थे।
कुछ समय से डॉ़ भीमराव अम्बेडकर को दिनोंदिन छोटा बनाने की साजिश चल रही है। जितनी संख्या में उनकी प्रतिमाएं लगाई जा रही हैं, उतने ही उनके विचारों, संदेशों को भुलाने का चलन भी बढ़ रहा है। यही नहीं, चर्च-पोषित और दूसरे संदिग्ध किस्म के कुछ लोग डॉ. अम्बेडकर के नाम का दुरुपयोग मनगढ़ंत बातें फैलाने में करते रहे हैं। इस गंभीर प्रवृत्ति के प्रति दलितों और गैर-दलितों, दोनों को सचेत होना चाहिए अन्यथा पूरे देश की हानि हो रही है।
डॉ़ अम्बेडकर के अनुसार लोकतांत्रिक राजनीति मूलत: लोकतांत्रिक समाज पर निर्भर है। देश की शक्ति और प्रगति उसके सामाजिक जीवन, उच्च स्तरीय नैतिकता, ईमानदार आर्थिक क्रियाकलाप, जन मनोबल, साहस और दैनंदिन आदतों पर आधारित होती है। इसीलिए वे राजनीतिक सुधारों से अधिक सामाजिक सुधार और सामाजिक पुनर्निर्माण पर बल देते थे। भारत के मुसलमानों का सामाजिक विश्लेषण करते हुए उन्होंने यह सविस्तार प्रमाणित किया। डॉ़ अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा,हिन्दुओं में सामाजिक बुराइयां हैं। किंतु एक अच्छी बात है कि उनमें उसे समझने वाले और उसे दूर करने में सक्रिय लोग भी हैं, जबकि मुस्लिम यह मानते ही नहीं कि उनमें बुराइयां हैं और इसलिए उसे दूर करने के उपाय भी नहीं करते।”
आरक्षण की बात को लेकर कुछ लोग डॉ़ अम्बेडकर की कटु आलोचना करते हैं, लेकिन उन्होंने आरक्षण के लिए एक समय सीमा तय की थी। पर हमारे नेताओं ने आरक्षण प्रणाली को वोट बैंक के हथियार के रूप में ले लिया। वे चुनाव आते ही आरक्षण का जुमला उठाते हैं और बाबासाहेब की याद दिलाकर वोट बटोरते हैं। पर डॉ. अम्बेडकर ऐसा कभी नहीं चाहते थे। आज जिस प्रकार राजनीतिक दल आरक्षण के नाम पर समाज को लड़ाने का काम कर रहे हैं, वे निंदनीय है। डॉ. अम्बेडकर को हिन्दू समाज में जातिगत अंतर और छुआछूत का दंश उन्हें सालता था। वे इस बुराई से मुक्त शक्तिशाली समाज का सपना देखते थे।

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