सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर लगाई रोक, कहा— क्या हम शिक्षा के ज़रिये समाज को पीछे ले जा रहे हैं?
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने 29 जनवरी को UGC के नए दिशा-निर्देशों पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह के नियम समाज को जोड़ने के बजाय कहीं उसे पीछे तो नहीं ले जा रहे। कोर्ट के इस आदेश को जहां सरकार के लिए झटका माना जा रहा है, वहीं नियमों का विरोध कर रहे पक्षों ने इसे बड़ी राहत बताया है।
“भारत को अलग-थलग समाज नहीं बनने देंगे”: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में अमेरिका जैसी “सेग्रेगेटेड स्कूल” व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अदालत ने सवाल उठाया— “क्या हम एक प्रतिगामी समाज की ओर बढ़ रहे हैं?”
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान देश की एकता का प्रतिबिंब होते हैं। अगर कैंपस के भीतर ही छात्रों को वर्गों में बांटने वाला माहौल बनेगा, तो वे बाहर की दुनिया में समावेशी सोच कैसे विकसित करेंगे। अदालत ने साफ कहा कि स्कूल और कॉलेजों को अलग-थलग चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पुराने नियम ही रहेंगे लागू, मार्च में अगली सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगली सुनवाई तक 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि नए नियमों को इस स्तर पर लागू किया गया, तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं और विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है।
क्या है पूरा विवाद
विवाद की जड़ 13 जनवरी को अधिसूचित UGC के “इक्विटी रेगुलेशन्स 2026” हैं। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटियों के गठन का प्रावधान किया गया था, जिनमें ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा बेहद सीमित कर दी गई है। उनका कहना है कि यह सुरक्षा केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग तक सीमित है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र शिकायत निवारण और संस्थागत सुरक्षा से बाहर हो जाते हैं।
अदालत में तीखी दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि नियमों की धारा 3(c) संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह सामान्य वर्ग को पूरी तरह बाहर रखती है। उन्होंने कहा कि परिभाषा ही भेदभावपूर्ण है।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने नियमों पर रोक का विरोध करते हुए कहा कि केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर नियमों को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि जाति या पृष्ठभूमि से अलग, हर व्यक्ति को भेदभाव के खिलाफ शिकायत का अधिकार होना चाहिए।
राजनीतिक स्तर पर भी उठा मामला
UGC नियमों को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। सांसद हरनाथ सिंह यादव ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई की मांग की और सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को भी दंडनीय बनाने का सुझाव दिया।
भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने भी प्रधानमंत्री से नियमों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, ताकि विश्वविद्यालयों में निष्पक्षता और भरोसा बना रहे।
फिलहाल राहत, आगे टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश से देशभर के शैक्षणिक परिसरों में चल रही असमंजस की स्थिति पर फिलहाल विराम लगा है। अब सबकी निगाहें मार्च में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि शिक्षा में समानता के नाम पर बनाए गए नियम समाज को जोड़ेंगे या और सवाल खड़े करेंगे।
