गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का शुभारंभ, स्वतंत्रता संग्राम में साहित्य की भूमिका पर हुआ मंथन
ग्रेटर नोएडा, 14 नवम्बर — गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय एवं भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का उद्घाटन समारोह शुक्रवार को विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित हुआ। इस अवसर पर देशभर से आए हिंदी प्राध्यापकों, शोधार्थियों और साहित्यकारों ने सहभागिता की।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह ने कहा, “हिंदी साहित्य ने स्वाधीनता संग्राम को शब्दों, विचारों और संघर्ष की लौ से जीवित रखा है। यह साहित्य समाज को नई दिशा देने वाला माध्यम रहा है।” उन्होंने हिंदी साहित्य के मूल संदर्भों और उसकी ऐतिहासिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय की अधिष्ठाता प्रो. वंदना पांडेय ने कहा कि “स्वाधीनता आंदोलन और हिंदी साहित्य का संबंध भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक चेतना और रचनात्मक संघर्ष की लंबी यात्रा को समझने का द्वार खोलता है।” उन्होंने सभी विद्वानों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
प्रो. संजीव कुमार दुबे ने ‘भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद’ के कार्यों और भावी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों और लोक कलाकारों ने स्वतंत्रता संग्राम को जनांदोलन का स्वरूप प्रदान किया। परिषद के अध्यक्ष प्रो. विनोद मिश्र ने हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं और लोक साहित्य के योगदान को भी रेखांकित किया।
कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने गुमनाम कवियों और सिनेमा के गीतकारों के योगदान को याद किया, जबकि उत्तराखंड ओपन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीनचंद्र लोहनी ने क्षेत्रीय कवियों की सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्हें इस अवसर पर ‘सारस्वत सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
संगोष्ठी में हिंदी कविता, कहानी, उपन्यास, कथेतर गद्य, पत्रकारिता, सिनेमा और भारतीय साहित्य में स्वतंत्रता आंदोलन के विविध पहलुओं पर केंद्रित दस समानांतर सत्रों में शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। सत्रों का संचालन डॉ. विभावरी और डॉ. रमिता गुरव ने किया।
त्रिपुरा, गोवा, तिरुपति, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्यों, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब सहित देशभर से आए हिंदी प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने संगोष्ठी में भाग लिया। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को और भी जीवंत बना दिया।
यह संगोष्ठी न केवल साहित्यिक विमर्श का मंच बनी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में साहित्य की भूमिका को पुनः स्मरण कराते हुए बौद्धिक जगत में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में स्थापित हुई।
