डॉ. शीतल सिंह भंडारी की पुस्तक “कुमाऊँ के स्थान नामों का अध्ययन” का लोकार्पण

उत्तराखंड के अकादमिक और सांस्कृतिक जगत के लिए गर्व का क्षण रहा जब प्रसिद्ध विद्वान डॉ. शीतल सिंह भंडारी की पुस्तक “कुमाऊँ के स्थान नामों का अध्ययन” का लोकार्पण नगर निगम सभागार, पिथौरागढ़ में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिलाधिकारी  आशीष कुमार भटगाई (आईएएस), विशिष्ट अतिथि सोबन जीना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. नरेंद्र सिंह भंडारी, तथा पिथौरागढ़ की महापौर  कल्पना देवलाल कार्यक्रम की अध्यक्ष अतिथि (Presiding Dignitary) के रूप में उपस्थित रहीं।

यह पुस्तक चार वर्षों के गहन अध्ययन पर आधारित है, जिसमें डॉ. भंडारी ने कुमाऊँ क्षेत्र के लगभग 3000 स्थान नामों का भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विश्लेषण किया है। यह दर्शाती है कि कैसे प्रत्येक नाम अपने भीतर भूगोल, आस्था और पारंपरिक संस्कारों की स्मृतियाँ समेटे हुए है।

अपने वक्तव्य में डॉ. भंडारी ने कहा कि “स्थान नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की स्थायी छाप हैं। हर नाम अतीत की एक फुसफुसाहट है — जहाँ धरती ने आकार लिया, परंपराएँ संरक्षित रहीं और समुदाय फले-फूले — जो हमें याद दिलाती हैं कि हम कौन हैं और कहाँ से आए हैं।”

मुख्य अतिथि  आशीष कुमार भटगाई, आईएएस ने कहा कि “यह पुस्तक इतिहास और अस्मिता के बीच एक सशक्त सेतु है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।”

कार्यक्रम की अध्यक्ष अतिथि  कल्पना देवलाल, महापौर पिथौरागढ़ ने कहा कि “यह पुस्तक आने वाली पीढ़ियों को यह समझने में मदद करेगी कि कुमाऊँ के प्रत्येक नाम में हमारी सामूहिक पहचान और स्मृतियों का अंश छिपा है। यह केवल स्थानों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का दर्पण है।”

प्रो. नरेंद्र सिंह भंडारी ने कहा कि “यह अध्ययन उत्तराखंड की सभ्यता की आत्मा को शब्दों में संरक्षित करता है और भाषाई धरोहर के संरक्षण में एक अमूल्य योगदान है।”

उत्तराखंड के  मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने अपने प्रशंसा पत्र के माध्यम से शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए कहा कि “डॉ. भंडारी का यह कार्य आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और उत्तराखंड की परंपराओं से जोड़ने वाला एक अमूल्य योगदान है।”

लेखक परिचय

डॉ. शीतल सिंह भंडारी का जन्म 22 नवम्बर 1952 को मड़गल, जिला पिथौरागढ़ में हुआ। उन्होंने कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से अंग्रेजी में M.A. और Ph.D. की उपाधि प्राप्त की।
उन्होंने 42 वर्षों तक अध्यापन किया और 2017 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चंपावत के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति ली। उन्होंने आईसीएसएसआर और यूजीसी, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित कई शोध परियोजनाएँ पूर्ण कीं और अनेक शोधार्थियों को मार्गदर्शन प्रदान किया।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि यह पुस्तक केवल एक शोध नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों, अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव को पहचानने का दस्तावेज़ है।

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