भारत को दर्पण दिखाता कश्मीर की इतिहास, विद्रोह एवं घटनाक्रम

नई दिल्‍ली (रोहित कुमार): आजादी के समय जब हिंदुस्तान का बंटवारा दो हिस्सों में हुआ तो सवाल उठा कि कश्मीर किस देश के साथ जाएगा मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना के अनुसार इसे पाकिस्तान में जाना चाहिए था क्योंकि उस समय कश्मीर की आबादी का लगभग 77% हिस्सा मुस्लिम थे और जिन्ना के पाकिस्तान की मांग मुस्लिम धर्म का हवाला देकर था.किंतु यह तर्क कश्मीर के लिए गलत था .वहीं दूसरी तरफ यहां के राजा हरि सिंह ने कश्मीर को भारत अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित नहीं करना का मन बनाया था. लेकिन कालांतर राजनीतिक स्थितियां ऐसी परिवर्तित हुई कि कश्मीर को भारत के साथ सम्मिलित होने में ही सुरक्षित महसूस हुआ.

कश्मीर का इतिहास
तत्कालिक समय में प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार हमें जो जानकारियां प्राप्त होती हैं उससे पता चलता है कि यह क्षेत्र मौर्य के शासन क्षेत्र के अंतर्गत आता था. इसके बाद यहां पर कुशान जाति के लोगों का शासन रहा. कुशान जाति के लोग बौद्ध धर्म को मानते थे इस वजह से इस स्थान पर बौद्ध धर्म का खूब प्रसार हुआ,और यह स्थान बौद्ध धर्म के अध्ययन का केंद्र बन गया कुशान वंश का महान राजा कनिष्क ने चौथा बौद्धिक काउंसिल का भी आयोजन किया था इन के उपरांत विभिन्न तरह के हिंदू राजाओं का समय-समय पर राज रहा है इन्हीं हिंदू राजाओं में से एक वंश ने सूर्य मंदिर मार्तंड की स्थापना की इसके बाद तेरहवीं सदी के आसपास इस्लाम कश्मीर में आया इस्लाम कश्मीर में आने पर यहां के कई लोगों का धर्म इस्लाम में बदल दिया गया अंततः यहां के राजा को भी इस्लाम में बदलना पड़ा इस समय कश्मीर सल्तनत की शुरुआत हुई थी कालांतर में सन 1586 के आसपास मुगलों ने कश्मीर पर कब्जा कर लिया यह समय अकबर के शासन का समय था इसके बाद अफगानी 1751 के आसपास कश्मीर में आक्रमण करना प्रारंभ किया .अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने इस समय को कमजोर मुगल को हराकर यहां पर अपना राज्य स्थापित किया. इसके उपरांत कुछ वर्षों के बाद साल 1819 में सिक्खों के तत्कालिक राजा महाराजा रंजीत सिंह ने अफगानी ओं को हराकर कश्मीर को अपने राज्य में मिला लिया साल 1846 में जब महाराणा रंजीत सिंह की मृत्यु हो चुकी थी इस समय अंग्रेजों ने सीख एंग्लो युद्ध में सिखों को हराकर यहां पर डोगरा वंश के लोगों को शासन करने के लिए छोड़ दिया डोगरा वंश के राजा महाराजा गुलाब सिंह ने इस राज्य में राजा बनने के लिए ₹7500000 दिए थे इसके बाद इस वंश ने यहां पर 100 वर्षों तक राज किया.

कश्मीर के राजा महाराजा हरी सिंह
महाराजा हरि सिंह साल 1947 के दौरान यह चाहते थे कि बंटवारे के बाद कश्मीर न तो भारत में शामिल हो और ना ही पाकिस्तान में हरी सिंह कश्मीर को एशिया का स्विट्जरलैंड बनाना चाहते थे. इस समय यहां पर नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के संस्थापक शेख अब्दुल्ला और उनके लोग कश्मीर में लोकतंत्र लाने के लिए काम कर रहे थे चाहते थे कि कश्मीर में किसी राजा का राज ना होकर लोकतंत्र की स्थापना हो या ऐसा हो कि राजा रहे किंतु राजा के पास बहुत सीमित शक्तियां हूं इस पार्टी को उस समय की पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस का भी पूरा सहयोग प्राप्त था इस समय पूरे देश को एक नए तंत्र की जरूरत थी और इस वजह से कांग्रेस देश में लोकतंत्र लाने के लिए शेख अब्दुल्लाह का साथ दे रही थी इस समय जिन्ना चाहते थे कि भारत दो भागों में हिंदू और मुसलमान के नाम पर विभाजित हो उनका यह मानना था कि दो देश बने जिसमें एक हिंदू बहुल और एक मुसलमान बहुल देश हो इस तरह से जिन्ना का कहना था कि उस समय के 77 फ़ीसदी वाले मुस्लिम आबादी वाला कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो जाए लेकिन महाराजा हरि सिंह ने ऐसा नहीं होने दिया और उन्होंने एक समझौता पर हंस साक्षर किया कि पाकिस्तान से दोनों देशों के व्यापार आदि जारी रहेंगे किंतु कश्मीर भारत का हिस्सा रहेगा.

साल 1947-48 की लड़ाई
भारत और कश्मीर के हस्ताक्षर और समझौता होने के बाद भारत ने अपनी सेना को पाकिस्तान से लड़ने के लिए भेजा और कश्मीर की पहली लड़ाई शुरू हो गई थी यह लड़ाई काफी ऊंचाई पर लड़ी गई जहां भारतीय सेना ने हेलीकॉप्टर का भी सहारा लिया था इस लड़ाई में पाकिस्तानी आर्मी को मुंह की खानी पड़ी थी और भारतीय सेना पाकिस्तानी आर्मी को पीछे खदेड़ने में सफलता प्राप्त किया था साथ ही कश्मीर की घाटी को अपने कब्जे में कर लिया.

आजाद कश्मीर मुद्दा
जिस समय यह लड़ाई चल रही थी उस समय कश्मीर के पश्चिमी इलाके में जैसे पुंछ और बारामूला आदि क्षेत्रों में पाकिस्तान के सहारे एक कठपुतली सरकार बनाई गई और इस क्षेत्र ने खुद को स्वतंत्र घोषित करके खुद को आजाद कश्मीर का नाम दिया यह आजाद कश्मीर आज भी मौजूद है जिसकी सरकार पाकिस्तान द्वारा चलती है इस आजाद कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद है कश्मीर का उतरी इलाका जिसमें गिल गीत बलूचिस्तान मुजफ्फराबाद मीरपुर आदि क्षेत्र पाकिस्तान में पढ़ने वाले कश्मीर में मौजूद हैं.

यूनाइटेड नेशन में कश्मीर समस्या
इस समस्या को लेकर भारत जनवरी सन 1948 में यूनाइटेड नेशन गया उस तरफ से पाकिस्तान भी इस मसले को लेकर यूनाइटेड नेशन पहुंचा यहां पर कश्मीरी समस्याओं को देखते हुए यूनाइटेड नेशन ने एक कमीशन बैठाया जिसका नाम यूनाइटेड नेशन कमिशन फॉर इंडिया एंड पाकिस्तान था इसमें कुल 5 सदस्य शामिल थे इन 5 लोगों ने भारत और कश्मीर का दौरा किया इसका हल निकालने की कोशिश की इस कोशिश से हालांकि कोई रास्ता नहीं निकला.
यूनाइटेड नेशन 3 शर्त
1. पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेनाएं तुरंत हटा लेनी चाहिए.
2.भारत को सिर्फ व्यवस्था बनाए रखने के लिए कम से कम सेना रखकर सभी आर्मी हटा लेनी चाहिए.
3. एक प्लेबिस्र्साइट लोगों का मत जानने के लिए लागू किया जाएगा
किंतु पिछले 70 वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी आर्मी कश्मीर से नहीं हटाई जिस वजह से आगे की भी दो शर्तें नहीं मानी गई पाकिस्तान का कहना है कि यदि उन्होंने फौज हटाई तो भारत उनके कश्मीर पर हमला करके अपने अधीन कर लेगा भारत को भी यही डर है इस तरह आज तक दोनों में से किसी देश ने भी अपनी सैन्य क्षमता यहां से नहीं हटाई.

कश्मीर में धारा 370
धारा 370 भारतीय संविधान का आर्टिकल है ना कि कश्मीर का संविधान का इस आर्टिकल को शेख अब्दुल्ला और गोपाल स्वामी आयंगर ने मिलकर ड्राफ्ट किया था इस धारा के तहत भारत के संविधान में कश्मीर को विशेष छूट दी गई है हालांकि आर्टिकल में टेंपोरल ई शब्द का इस्तेमाल किया गया है जिससे यह पता चलता है कि दी गई छूट अस्थाई है ध्यान देने योग्य बात यह है कि जम्मू कश्मीर में कानून बनाने का अधिकार वहां के स्टेट असेंबली को है यदि भारत की केंद्र सरकार वहां पर अपने बनाए गए कानून लागू करवाना भी चाहती है तो पहले उसे वहां के स्टेट असेंबली में पास कराना होता है इसके अलावा कश्मीर में भारत के अन्य राज्यों में से कोई भी व्यक्ति जाकर अस्थाई रूप से नहीं रह सकता है वहां पर जमीन नहीं खरीदा जा सकता है धारा 370 पर सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबा भीमराव अंबेडकर पूरी तरह खिलाफ थे उन्होंने धारा 370 को ड्राफ्ट करने से इनकार कर दिया था ध्यान देने वाली बात यह है कि बीआर अंबेडकर ने पूरा संविधान तैयार किया किंतु धारा 370 ड्राफ्ट करने से इनकार कर दिया था.

कश्मीर में मिलिटेंसी
साल 1987 में कश्मीर के असेंबली चुनाव के दौरान नेशनल कांफ्रेंस और भारतीय कांग्रेस ने मिलकर बहुत भारी गड़बड़ी की और वहां उन्होंने चुनाव जीता चुनाव में बहुत भारी संख्या में जीते जाने पर दोनों पार्टियों के विरोध काफी प्रदर्शन हुए और धीरे-धीरे यह प्रदर्शन आक्रमक और हिंसक हो गए इस हिंसक प्रदर्शनों का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने इन्हीं प्रदर्शनकारियों में अपने ही जब उल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अलगाववादियों को शामिल कर दिया इस वजह से यह स्थिति और बुरी होती चली गई और इस कश्मीर की आजादी से जोड़कर लोगों के बीच लाया गया युवा कश्मीरियों को सरहद पार भेजकर उन्हें आतंकी ट्रेनिंग दी जाने लगी इस तरह के सभी गतिविधियों में कई आतंकी संगठन संलिप्त थे साथ ही कश्मीरी युवकों को आर्थिक मदद का लालच भी दिया जाता था.

कश्मीर में पंडितों की समस्या
साल 1990 में कश्मीरी पंडितों को बहुत अधिक विरोध और हिंसा झेलना पड़ा कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी में एक अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय है हालांकि ए अल्पसंख्यक थे फिर भी इन्हें अच्छी नौकरियां प्रशासन में अच्छे पद पर आसीन थे साथ ही बहुत अच्छे पढ़े-लिखे थे इस दौरान इनके खिलाफ कई धमकियां आनी शुरू हुई और कई बड़े कश्मीरी पंडितों को सरेआम गोली मार दी गई इन्हें दिनदहाड़े धमकियां दिए जाने लगी यदि इन्होंने घाटी नहीं छोड़ा तो जान से मार दिया जाएगा इस तरीके की खुली चेतावनी और धमकियां दिए जाने लगी.किया भी कुछ ऐसा ही गया लगभग 200 से 400 कश्मीरी पंडितों को 2 से 3 महीने के अंदर मार दिया गया इसके बाद यहां से कश्मीरी पंडित रातों-रात विस्थापित होने लगे.
इस घटना के पीछे एक वजह यह भी थी कि इस समय केंद्र सरकार ने जगमोहन को केंद्र का गवर्नर बनाया था फारुक अब्दुल्ला ने कहा था कि यदि जगमोहन को गवर्नर बनाया गया तो वह इस्तीफा दे देंगे और इस पर फारुख ने इस्तीफा दे दिया कश्मीर में इसके बाद पूरी तरह से अव्यवस्था और अराजकता फैल गई थी इस अराजकता में पड़े कश्मीरी पंडितों को अपना घर अपने व्यापार आदि छोड़कर जम्मू अथवा दिल्ली आना पड़ा.कश्मीरी पंडित आज विभिन्न कैंप में बहुत गरीबी में अपनी जिंदगी भी गुजारा कर रहे हैं.

कश्मीर में AFSPA
इस तरह की अराजकता को देखते हुए भारत सरकार ने यहां पर आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट लागू किया या भारत में पहली बार लागू नहीं हुआ था इससे पहले कुछ उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में यह लागू किया जा चुका था इस एक्ट के अनुसार सेना को कुछ अतिरिक्त पावर दिए जाते हैं जिसकी सहायता से वे किसी को सिर्फ शक के निगाह पर बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं किसी पर संदेह होने से उसे गोली मार सकते हैं और किसी के घर की तलाशी भी बिना वारंट के ले सकते हैं यह एक्ट एक ऐतिहासिक फैसला के रूप में देखा जाएगा क्योंकि इसके बाद कश्मीर में व्यवस्था को स्थापित करने में वहां की सरकार को थोड़ी सफलता जरूर मिली थी आज के मौजूदा परिवेश में देखे तो मिलिटेंसी की संख्या कश्मीर में अपरोक्ष रूप से बढ़ रही है जो कि दिन-प्रतिदिन घातक हो रही थी लेकिन हाल के समय में मौजूदा सरकार की जो रवैया है वह भी संतोषजनक है जिसके माध्यम से शांति व्यवस्था और शासन को उचित तरीके से विकास के कार्य करने का अवसर मिलने की संभावना है.

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